Monday, 12 March 2012

नमन करहु मन धरा बिछत, अभय देयो मोहे ऐ प्रभु राम,
नील सुन्दर नयनाभिराम छबि,आत्म मिले मोक्ष बिश्राम,
सकल दुःख व्याधि हरता, मम भर्ता क्रिया कर्ता ऐ श्री राम,
जगपालक जगपोषण कर्ता, श्रृष्टि विधाता क्षीरवासिने राम,
निधिदायक,सुख-कारक, सदाचारी, सुबिचारी,पुरोषोतम राम,
जन-नायक जन नियामक,प्रजारक्षक, भूस्वामी प्रभु राम,
परान्तक पुरान्तक सुगामी नवरचिता, नवअन्वेषक श्री राम,
पुरुषश्रेष्ट पुरषार्थ नायक, दंडाधिकारी सुचारी महानृप श्री राम,
असुरान्तक, हनुमंतेश्वर, शिवजपणं, रामेश्वर निमिता श्री राम,
कामविजिता, नियमाधिनायक,जपत मन निरंतर श्री राम ,
जय श्री राम जय जय श्री राम, समस्त जन-पालक श्री राम ...
---मन वकील 

Sunday, 11 March 2012

कभी कभी बस चुपचाप रहना बेहतर समझता हूँ मैं,
कभी कभी बस खुद से ही कहना बेहतर समझता हूँ मैं,
ना जाने किसी बात पर अपने आप ही बेबात न हो जाऊं,
इस डर में बस अक्सर खुद को कमतर समझता हूँ मैं,
कभी रास्ते खोजते है मुझे, कभी मैं उन्हें खोजता रहता,
बस इस खोज की कशमकश में खुद को बदतर समझता हूँ मैं,
कभी कभी बस चुपचाप रहना बेहतर समझता हूँ मैं,
कभी कभी बस खुद से ही कहना बेहतर समझता हूँ मैं,
रोशनी ने कभी भी आकर मेरे दामन को ठीक न पकड़ा,
बस अँधेरे में जीकर उसे अपना हमसफ़र समझता हूँ मैं,
मौसम की हर चोट मैंने आसमां बन खुद पर है झेली ,
अब तो अपने आप को अक्सर इक पत्थर समझता हूँ मैं,
कभी कभी बस चुपचाप रहना बेहतर समझता हूँ मैं,
कभी कभी बस खुद से ही कहना बेहतर समझता हूँ मैं,
मत बैठ मेरे पास कभी, वर्ना तू भी हो जायेगा इक अजाब,
हसरतों को देखेगा शीशे सा टूटते, ऐसा अक्सर समझता हूँ मैं,
मेरे सीने पर अब है उस वक्त की बेरहमियत के कई निशाँ,
अरे अपने आप को मैं, उस खुदा से बेहतर समझता हूँ मैं,
कभी कभी बस चुपचाप रहना बेहतर समझता हूँ मैं,
कभी कभी बस खुद से ही कहना बेहतर समझता हूँ मैं,
===मन-वकील

Friday, 9 March 2012

मौसम की अज़ान बदल दो, हवाओं की भी तान बदल दो,
नहीं बदल सकते औरों को, तो खुद की ही पहचान बदल दो,
सन्नाटों के तीर क्यों हो सहते, गंदे नाले नदियों में क्यों बहते,
कटाक्ष यदि तुम सह ना पाओ, तो सहने की चौपान बदल दो,
नहीं बदल सकते औरों को, तो खुद की ही पहचान बदल दो,
बादल घटा घनघोर छाई है, धुओं में भी अब अग्नि आई है,
नर्म गर्म होकर क्यों रोना अब,खुद जलने के शमशान बदल दो,
नहीं बदल सकते औरों को, तो खुद की ही पहचान बदल दो,
वादों पर क्यों भरोसा अब करना,काहे जीवन में पल पल मरना,
तिल तिल घुट कर तुम क्या पाओगे, ये नित मरने के निशान बदल दो
नहीं बदल सकते औरों को, तो खुद की ही पहचान बदल दो,
बानी में अब नरमी कैसी तुम लाओ, यदि छीन कर जो तुम पाओ,
हाथ फैलाकर क्यों खड़े मांगते हक़, मार्ग में आये सब पाषाण बदल दो,
नहीं बदल सकते औरों को, तो खुद की ही पहचान बदल दो,

=मन-वकील

Wednesday, 7 March 2012

रंग बरसे चहु ओर, छटा निराली एहो छाई,
कियो दहन होलिका, रंगीली होरी अब आई,
भर पिचकारी रंगों से,दोहु कर अपनों बहुराई
भिगो दियो गौरी, कंचुकी चोली झलक सबुराई,
ठन ठन चपल चलत, मुख गुलाल दे मसराई,
कियो दहन होलिका, रंगीली होरी अब आई,
ढोल बजे सहु नगाड़े,बरसत जल बिन बदराई,
फागुन दियो पछाड़, विसार देब माघ एहो भाई,
नभ तापस लायो, धरा धूरि एहो लाल लभुराई,
कियो दहन होलिका, रंगीली होरी अब आई,
नव प्रेयसी करत, ठिठोरी एहो चहकत सघुराई,
मुख चुम्बन धरत, रपटत आलिंगन मधुमाई,
तन कियो सुगन्धित, काम रति ज्यो मुग्धाई,
कियो दहन होलिका, रंगीली होरी अब आई,
नमन सबहु इहा, जन मानस फोरम जसराई,
बसे सबरे जीवन, एहो रंग-सुगंध कण कनाई,
दीयो आसीस मन, तिस रहत सबै चित हर्षाई 
खेलत बढ़त बट ज्यो, पाबे सम्पदा निध सौराई,
कियो दहन होलिका, रंगीली होरी अब आई,

Thursday, 1 March 2012

अज़ब सी दास्ताँ है मेरे यार की , ऐ दोस्तों,
मुरझाये फूलों से गुलिस्तान सजाए रखता,
रंग भरता कभी झूठे सच्चे उनमे खुशबू संग,
बीती यादों से अपने दिल को लगाए रखता,
मैं गर पूछूं उसकी इन नादानियों की वजह,
वो संगदिल हमसे से यूँ दुश्मनी लगाए रखता,
और गर ना पुछू इन अकीदों का कोई सबब,
तो बस मेरा यार खुद को युहीं जलाए रखता .....
==मन-वकील

Thursday, 23 February 2012

मोहे कहे वो कविवर , जो स्वयं रज रज छंद रचाए,
मुग्ध करें सबरो जन, सौरभ सो कबि कौन सजाए,
प्रभु अनुकम्पा सो रहे, नव गीत इहा नित-२ रचाए,
निज रहत गुणी महागुनी, बन अनुज मोहे भरमाय,
काहे देबत मोहे इहो पद,मन वकील कबहू चितलाय,
सुगंधि बन छायो रहत, सौरभ गीतकार भलो कहलाय ...................
==मन वकील
रगड़ रगड़ पड़ती रही मन पर, उभर उभर पड़े मन के सब दोष,
सिमट सिमट गया मैं जब-तब, विषम बन गया हूँ लेकर सब रोष,
अंतहीन पीड़ा रहने लगी मन में,मृत होने लगा मन का सब जोश,
गहरी छाया थी पड़ी दुखों के, दिखने लगा सब महू बस दोषम दोष,
इसको छीलूं या उसको काटू, अत्याचार करूँ सब पर बन कुभोष,
सिमट सिमट गया मैं जब-तब, विषम बन गया हूँ लेकर सब रोष,
आशा की किरणों ने छोड़ा आना, अन्धकार ने छीना सर्व तेजोजोश,
व्यथित हो उठा अब मैं ज्वलित सा, अग्नि बानी में भरने लगी दोष,
यहाँ वहां बस कुलषित हो फिरता,बाँट रहा दूषित भावों से माह पोष, 
सिमट सिमट गया मैं जब-तब, विषम बन गया हूँ लेकर सब रोष,
===मन-वकील