Sunday, 21 July 2013

चंद दाग जो मेरी शख्सियत पर है उभरे,
वो मेरे आज को करते रहते यूँ दागदार,
मैं अनजान बना रहता खुद से ही अक्सर,
मेरा साया ही बन बैठा अब मेरा राज़दार 

Wednesday, 17 July 2013



कहे क्या किस से मन वकील, अब हर ओर ही है बंदिशें,
कभी अल्फाज़  है फिसलते, कही खड़ी हो जाती है रंजिशें,
दोस्त कहे भी तो कहे किसको,हर कहीं है रूठने का डर,
कोई छीन ले मेरी जुबाँ,यूँ फिसल जाती कमबख्त  अक्सर 
==मन वकील 

Wednesday, 10 July 2013


गौरी तोहे भाये सबहु रास रंग, 
काहे करहु तू पीया अपने तंग,
कबहु लगाये माथे पहु बिंदिया,
देख-२ उडत वाको मुई निंदिया,
मुग्ध करे नित निज "सुनील" 
नैनं कजरारे लगे ज्यो छबील,
गजगामिनी मोहिनी जैसे सुधा,
बसे अंक सुनील, जो ब्रह्म वसुधा 

Saturday, 6 July 2013

कचहरी

कचहरी के दर पर आकर हुआ मुझे ये मालूम,
लोग किस कदर घर में फ़साद किया है करते,
उसको रुलाते है कटघरे में,पल पल देकर ताना,
अब रंजिशे रखे है उससे, जिसपे वो कभी है मरते ....
==मन वकील 

Monday, 1 July 2013

बचपन

बचपन की बातें, वो स्कूल में की हुई बातें,
मास्टरजी की डांट, छिपाछिपी की वो रातें,
प्लेग्राउंड में बैठ वो दोस्तों के साथ किये लंच,
वो क्लास में बिछे डेस्क,ऑडिटोरियम में मंच,
तुनक में हम यूँ रूठें, कभी बेलगाम यूँ हँसना,
कभी शरारतों में उलझे,वो पनिशमेंट में फंसना,
माँ का वो लाड ऐसा, कभी माँ की मीठी झिडकी,
कभी बंद हुए यूँ दरवाज़े, कभी खुली कोई खिड़की,
अभी सब पास मेरे था, ना जाने अब कहाँ खो गया,
चन्द रातें क्या बीती,बस मेरा बचपन कहीं खो गया ..
==मन वकील 
 
  

Saturday, 15 June 2013

माँ से नहीं है ख़ास वो,
पर माँ जितना वो ख़ास,
जीवन का सृजनकर्ता वो,
संचरित हुई उससे श्वास, 
चेहरे पर मुस्कान लेकर,
स्वयं दायित्व का अहसास,
नमन करूँ पिता को अपने,
तरुछाया सा,वो है मेरा प्रभास  ...
==मन वकील के मन की आवाज़ 


वक्त की आहट में, हम खुद को ही खोजते रहे,
कब मिलेगी खुद से खुद को राह,ये सोचते रहे,
कुछ रंजिशे थी, कुछ था उनका वो बेबाकपन,
कभी मुहँ छुपाये रहे,कभी दिखाते अपना फन,
उनके दिये हर जख्म को,यूँ खुद को कुरेदते रहे,
वक्त की आहट में, हम खुद को ही खोजते रहे,
तन्हाइयों की मत पूछ मुझसे,वो सरमाया मेरा,
उनमे बसकर अक्सर,देखा करते यूँ साया तेरा,
मालूम था हमे,तुम ना आ पाओगे कभी मुझ तक,
घर का मेरा पता भी,तुम भुला चुके होगे अब तक,
फिर ना जाने क्यों,नजरो से राह यूँ टटोलते रहे,
वक्त की आहट में, हम खुद को ही खोजते रहे,
==मन वकील के मन की आवाज़