Wednesday, 9 November 2011

बिदेस गए प्रिये तुम, अब मोहू कैसो शरद
बांस फांस चुभन लगो, तन में जियो सो दर्द,
सीतल पवन नाही सुहाहे,छुवत रहे तस गाल,
स्याह हुई रतिया,धीमी तासु दुनी एहू चाल,
खग भी न करते, मौसे बतिया भूले कलरव,
नैनन अब बौर लगे, थके राह तकते जब-तव,
सेज लगे मोहे भरी, काँटों सो बिछी एक चादर,
परछाई मोहे भय करै,पीछे ध्वनित जो सरसर,
लौट आओ अब पिया, काहे खोज़त मुद्रा स्वर्ण,
जोबन बीतो तिस रोवत,बैरागी भयो अब मन ....
===मन वकील

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