" माँ "
कोई कहता है वो धरा पर ईश्वर का रूप
कोई कहता है वो जीवन-दायनी स्वरुप,
सबसे अनोखी वो छाँव,होगी ऐसी कहाँ,
मेरे लिए तो है वो सबसे प्यारी मेरी माँ
जब भी तपता मैं ज्वर में किसी भी रात,
मेरे सिरहाने बैठ माथा सहलाते उसके हाथ,
मेरी पीड़ा को पहचानती वो है मेरा जहाँ,
मेरे लिए तो है वो सबसे प्यारी मेरी माँ
मैं कभी भूखा सो जाऊं, वो होने न देती,
मेरे लिए वो खुद अपनी नींद भुला देती,
मेरी प्रथम गुरु,मार्गदर्शिका ऐसी हो कहाँ,
मेरे लिए तो है वो सबसे प्यारी मेरी माँ ///
===मन वकील
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