Thursday, 2 May 2013

                           " शहीद "
           वो रोज़ मरता था , उस जेल की कोठरी में,
           हर रोज़ बिना नाग़ा, पल पल घुट घुट कर,
           इस देश के लिए अपनी जवानी लुटाते हुए,
           कभी पीटा जाता बेवजह,कभी बेकारण ही,
           सहता वो चुपचाप, मन पर जिस्म पर सब,
           रोज़ इक नया नश्तर,नए घाव छोड़ जाता, 
           अब तो आँसू भी सूख गये थे उन आँखों में,
           जिनमे कभी बसती थी रिहाई की उम्मीद,
           कौन करवाता उसकी रिहाई? क्यों? कब? 
           जब उसके वतन ने ही भुला जो दिया उसे,
           अहसान फ़रामोश मंत्री,संग बहरी सरकार,
           अपनों को रुलाने में,जो गैरों को मनाने में,
           अपना फर्ज़ भुला बैठी वो बैगैरत सरकार,
           इक दिन ऐसा आ ही गया,जब वो शख्स, 
           खूब पिटा, बिल़ा वजह पिटा, उस जेल में,
           हड्डियां टूटी, अंग बे-अंग हो गये नीले से,
           फिर कितने दिन और लड़ता वो जुल्म से,
           बस मौत की परी ले गयी अपने साथ उसे,
           सब दर्द सब जुल्मों से परे,अपने साथ उसे,
           फिर जागी वो बैगैरत सरकार नींद से ऐसे,
           आननफानन में दे दिया तमगा "शहीद" का,
           उस सच्चे शहीद की जख्मों से भरी लाश को ...
          ==मन वकील

Sunday, 28 April 2013

                 गूंगा अब बेशर्म बन गया है।

  कई साल पहले, एक बड़े देश के सिंहासन पर,
  बैठा दिया नेताओं की जुन्डली ने ऐसे मिलकर,
  इक गूंगे को, कुछ जुगत भिड़ा, कुछ सोचकर,
  जो बस मुहँ ना खोले, चुप रहे वो सब देखकर,
              गूंगे के होते घोटालों का ऐसा अनोखा दौर चला,
              देश में यहाँ वहाँ बस भ्रष्टाचार का ही जोर चला,
              किसी मद में,कही भी,हर राह पर नेता ही फला,
              सरकारी खातों की छाया में,नेता का ही पेट पला,
कभी कोयला खाया, कभी खेलों के नाम पर खाया,
कहीं हेलिकोप्टर मंगाए, कही छाई टूजी की माया,
मनरेगा की लूटी फसल,जो नेताजी ने खूब कमाया,
भारत निर्माण के नाम पर, देश में अँधेरा ही फैलाया,
             सीमा पर जवानों के सिर कटे,खून से भारत सन गया,
             नारी पर हुई हिंसा,आक्रोश प्रदर्शन में सर्व जन गया,
             आ बैठा चीन भारत में, अब लद्दाख में तम्बू तन गया,
             और वो जो गूंगा है नेता गद्दी पर, अब बेशर्म बन गया ............
==मन वकील 

Thursday, 25 April 2013

धरा हरी हरी सी, फैले हो चारों ओर वन,
रहेंगे सभी जन स्वस्थ,हसंता रहेगा मन,
ना होगा पर्यावरण दूषित,ना दूषित वायु,
सभी जन हो चिरंजीव, कम ना हो आयु,
बच्चें खेले कूदे,बलवान बने उनका तन,  
धरा हरी हरी सी, फैले हो चारों ओर वन,
चिड़ियों का कलरव,तितलियाँ करे निरत,
आनंदित होय नभ,मरू भूमि होय विरत,
परबत से बहे नदियाँ,ध्वनि करें कल-कल,
कोई खेत ना हो बंजर,कृषक ना हो विकल,
पर्व रंगों के हो इत उत,प्रमोद करे सर्वजन,
धरा हरी हरी सी, फैले हो चारों ओर वन,
==मन वकील   

Sunday, 21 April 2013

                

                                 " माँ "


         कोई कहता है वो धरा पर ईश्वर का रूप 
         कोई कहता है वो जीवन-दायनी स्वरुप,
        सबसे अनोखी वो छाँव,होगी ऐसी कहाँ,
         मेरे लिए तो है वो सबसे प्यारी मेरी माँ 
              जब भी तपता मैं ज्वर में किसी भी रात,
             मेरे सिरहाने बैठ माथा सहलाते उसके हाथ,
             मेरी पीड़ा को पहचानती वो है मेरा जहाँ,
             मेरे लिए तो है वो सबसे प्यारी मेरी माँ 
      मैं कभी भूखा सो जाऊं, वो होने न देती,
      मेरे लिए वो खुद अपनी नींद भुला देती,
      मेरी प्रथम गुरु,मार्गदर्शिका ऐसी हो कहाँ,
       मेरे लिए तो है वो सबसे प्यारी मेरी माँ ///
===मन वकील 
              
    

                                      "मित्र"


  दो अक्षरों में ना हो सकता परिभाषित,
  केवल एक मात्रा में न सीमित संसार ,
  वो मेरे दुःख सुख सब सुनता पिरोता, 
  वो "मित्र" मेरे जीवन का है एक आधार,
          संकट हो जब भी, कोई छुपकर कभी आता,
          वो "मित्र" आगे आकर मेरी ढाल बन जाता,
          अनुचित से मुझे सदैव बचाकर ऐसे रखता,
          जीवन में भरने लगता मेरे भीतर सदाचार,
 हँसी ख़ुशी में मेरी पल पल वो हो शामिल,
 आनंद प्रमोद के रंगों से बना मुझे काबिल,
 मेरे निर्णय क्रिया कलापों पर रखता नज़र,
 वो "मित्र" ना केवल साथी, बल्कि सलाहकार,
 वो मित्र मेरे जीवन का है एक आधार 
        ===मन-वकील 

Saturday, 20 April 2013

सर्द है वो आहटें, जो अचानक दस्तक देती,
वो नन्ही ठिठक कर,सहम सी जाती ऐसे,
कहीं हैवानियत बदल अपना रूप यूँ आती,
अंकल हाथों में टाफी लिए आये कभी जैसे,
नन्ही के मासूम चेहरे पर रेंगते वो दो हाथ,
किसी कालिख मल रहे हो रगड़ कर जैसे,
वो आँखों में छुपी उस अंकल के, वो वासना,
किसी दरिन्दिगी के आगाज़ की पहचान जैसे,
उस नन्ही के शरीर पर वो बनते हुए ज़ख्म,
चीख चीख कर दुहाई देते इंसानियत की, जैसे,
मैं बाप हूँ उस नन्ही का,जो जुल्म सह आई इतना,
बोलो ऐ दुनिया, अब जी पाऊंगा मैं तुझमे कैसे? 
==मन वकील के मन की आवाज़ 

Tuesday, 26 March 2013

सतरंगी रंगों में सजकर देखो फाल्गुन आया,
उड़े गगन में अबीर गुलाल, ऋतु राज भौराया,
             सरसर मारे पिचकारी, मेरो प्यारो नन्द गोपाल,
             आई होली रे,अरे आई होली रे,कैसो मस्त धमाल,
             मोरपंख  धरे सीस पर,कन्हाई मेरो गहरो कूद लगावे,
             जिस तिस देखे वो गोपिका,वाको भरभर रंग लगावे,
             नन्द के लाला करे रास,रंगआनंद चहु दिश ऐसो छाया 
             सतरंगी रंगों में सजकर देखो फाल्गुन आया,
इत उत दौड़े बाल गोपाल, हाथों में भर भर रंग गुलाल,
सांवरी छबि मन मोहे रही,प्यारो लगे मोहे जसोदा लाल,
माखन भयो गुलाबी अबहु, सुंगंधि देत रहो चन्दन सौ कैसी,
गैयाँ भी सजे रंग में, अरे गैया होय गुलाबी लगो कामधेनु जैसी,
होरी खेलत गोकुल को प्यारो नटराज, देखो कैसो खेल दिखाया,
सतरंगी रंगों में सजकर देखो फाल्गुन आया,
           छिप छिप रही सबहु गोपियाँ,रंग ना देहो कोहू और डार,
           मन में बसे श्याम,अबहु मोहे केवल आन रँगे नन्द कुमार,
          अरे करे प्रतीक्षा सबरी अँखियाँ, निहारे अपने हरि की राह,
          कब आओगे श्याम मोहु रंगने, पिया मिलन मोहे ऐसो चाह,
          गोप कुमारी होए रही अधीर, मधुमास ज्यो फाल्गुन में आया,
          सतरंगी रंगों में सजकर देखो फाल्गुन आया,
          उड़े गगन में अबीर गुलाल, ऋतु राज भौराया,
             =========मन वकील