श्री कृष्ण है जो भीतर मेरे एक विराट स्वरुप,
वर्षा ऋतु है और कभी जेठ माह की तीव्र धूप,
जो विरल है कभी तो कभी सरल और अनूप,
अभिव्यक्ति से है परे कभी,वो अनुपम एक रूप,
जल में है कभी वायु में, या धरा के है अनुरूप,
कण कण में वो बसा, जीवन मरण के प्रारूप,
बंसी की धुन में, और कभी मृदंग के ताल भूप,
गोपियों संग नाचे,और कभी जसोदा सो सहुप,
श्री कृष्ण है जो भीतर मेरे एक विराट स्वरुप,
वर्षा ऋतु है और कभी जेठ माह की तीव्र धूप,
जो विरल है कभी तो कभी सरल और अनूप,
अभिव्यक्ति से है परे कभी,वो अनुपम एक रूप,
जल में है कभी वायु में, या धरा के है अनुरूप,
कण कण में वो बसा, जीवन मरण के प्रारूप,
बंसी की धुन में, और कभी मृदंग के ताल भूप,
गोपियों संग नाचे,और कभी जसोदा सो सहुप,
श्री कृष्ण है जो भीतर मेरे एक विराट स्वरुप,
No comments:
Post a Comment