Friday, 7 September 2012

"खोया हुआ नसीब"

               
बुढ़िया की मोतियाबिंद से सजी आँखों में,
कम दिखाई देती परछाइयों,ओझल उजाला,
जिन्हें कल संजोये थी अपनी खोख में वो,
जिन्हें खिलाती रही थी वो भर भर निवाला,
वो आज कहाँ जा बसे,अब क्यों नहीं करीब,
धुंधली धुंधली लकीरों सा,खोया हुआ नसीब,
कूड़े के ढेर पर बैठे कुक्कर के संग वो नन्हे,
नन्हे हाथों से बीनते थे कागज़ के चीथड़े वो,
वो चंद चीथड़े भी आज है उनके तन पर भी,
चेहरे की टूटी मासूमियत भी छूटने को जो,
शक्ल पर अब बेबसी है जो आ बैठी करीब,
बदबू से लिपटे मासूमो का,खोया हुआ नसीब,
कभी भागती रहती यहाँ से वहां हो बदहवास,
वो चंद मुड़े कागज़ मुठ्ठी में,लेने न देते श्वास,
वो छोड़ चला गया उसे, अब घेरती उसे यह धूप,
बार बार आँखों में उभर आये बेबसी बन भूख,
बड़े बाबू की वो भूखी नज़रें,क्यों लगती करीब,
क्यों जिन्दा है वो सोचती, खोया हुआ नसीब ...
==मन वकील

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