Wednesday, 7 November 2012

था मेरे आँगन में भी एक पैसों वाला पेड़
जहाँ से गिरते रहते थे रोज़ पैसों के ढेर,
लगते थे जहाँ पैसे से उम्मीदों वाले फल,
हर काम आज ही होता था न पडती कल,
खुशियों की पैरवी करते सुविधा साधन,
नाच नाच मयूर हो उठता था मेरा मन,
कभी सावन था और कभी रहता बसंत,
नित नए पकवान दावतों का नहीं अंत,
कभी पहाड़ों की सैर कभी समुद्र मंथन,
रोज़ बैंक के चक्कर लगा जोड़ते थे धन,
फिर अचानक वो पेड़ को लग गयी नज़र,
धीरे धीरे होने लगा उसपर सूखे का असर,
पत्ते अब रोज़ नहीं लगते उसकी डाल पर,
मेहनत का पसीना भी होने लगा बेअसर,
अब वो पेड़ लगा झुलसने हो कर बर्बाद,
कहाँ से देता मैं उसमे बेईमानी की खाद,
इक दिन आया वो पेड़ बन गया था ठूँठ,
मैं खामोश था पीकर बदकिस्मती का घूंट,
भ्रष्टाचार का कीड़ा मेरे पेड़ की जड़े खा गया,
मन-वकील तू अब देख कैसा समय आ गया ....
==मन वकील     

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