Wednesday, 14 November 2012

           
  कैसा यह बालदिवस है?
     जब मासूम चेहरे पर छाई हो भूख की चादर,
    वो टेबल पोंछते नन्हे मासूम झेलते अनादर,
    नन्हे हाथ जो बीनते है गलियों में कूड़े के ढेर,
    चेहरे में मासूमियत के जगह कालिख अँधेर,
    क्रूर हाथो से झेलता जो नित नयी सी हवस है,
    सड़कों पर रोता फिरता,कैसा यह बाल दिवस है,
    कभी बंद कमरों में झेलता फिरता है घूंसे लातें,
    कभी झूठे बर्तनों से बैठ कर दुःख अपने है बांटे,
    कभी चौराहों पर गुब्बारे बेचे,कमाए चंद सिक्के,
    कभी मंदिरों में, लंगरों में भूख में बस खाए धक्के,
    पैदा हुआ तो शायद था उजाला, अब वो तमस है,
   
सड़कों पर रोता फिरता,कैसा यह बाल दिवस है,
    अखबारों के इश्तिहारों में वो चंद मुस्कराहट भरी,
    नेताओं की तस्वीरों के नीचे वो नन्ही बालिका खड़ी,
    इन बंटते वजीफों का अब हकदार कौन है भाई,
    सरकारी बाबू और अध्यापकों से कैसी लूट मचाई,
    सरकारी अनुदान अब मिटाते किस की वो हवस है
     सड़कों पर रोता फिरता,कैसा यह बाल दिवस है,   
     ===मन वकील




  

 

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