ना कोई आता है अब मेरे घर पर ,
ना मैं बुलाया जाता किसी दर पर,
बस मसरूफ़ सा हूँ अपने आप में,
अब जी रहा हूँ दोस्तों से झगड कर,
कोई आहट भी जरा सी कहीं होती,
कलेजा मुहँ को दौड़ पड़ता यूँ डर कर
ना कोई आता है अब मेरे घर पर ,
ना मैं बुलाया जाता किसी दर पर,
मेरे बाजुओं में आकर कभी तो सिमट,
क्यूँ चले, तू किसी और को पकड कर,
रंजिशें भी रखे,कभी प्यार भी जतलाये,
फिर आँसुओं को बिखरे मुझसे यूँ लिपट कर
ना कोई आता है अब मेरे घर पर ,
ना मैं बुलाया जाता किसी दर पर,
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