जो आये थे कभी यहाँ, महफ़िल सँवारने को,
वो आस्तीन के सांप बन,इसे बिगाड़ चले गये,
क्या सूरत थी इस सुर्ख महफ़िल की,वो हमारी,
इस अहले चमन को यूँ ही उजाड़ कर चले गये,
गर ना चाहते थे वो, इस आवाम ओ गुलिस्ताँ को,
तो कह देते हमें, कर देते उन्हें हम प्यार से रुखसत,
किया खुद को भी जलील,लिख जलालत से भरे ख़त,
खुद ही अपनी शख्सियत को क्यूँ बिगाड़ कर चले गये
जो आये थे कभी यहाँ, महफ़िल सँवारने को,
वो आस्तीन के सांप बन,इसे बिगाड़ चले गये,
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