हर आदमी ही आया इस जहाँ में बस अकेला,
कितने अकेले जो मिले, लग गया इक मेला,
कोई चले धीरे-धीरे,कोई चलता तेज़ अविराम,
कोई पहुंचे मंजिल तक,कोई करे राह में विश्राम,
अनजानी डगर सभी की,अनजाने ही आते दौर,
सूने सूने रास्ते सूने मन,हमराही ना कोई और,
तेज़ पड़ती धूप मुझपर,व्याकुल होती मेरी काया,
ना कोई मेरे साथ चलता, साथ चले मेरा ही साया ===मन वकील
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