Wednesday, 12 October 2011

इस जीवन का एक सार बना दो,
आज मुझे बलि पथ पर चला दो,
सत्य नहीं असत्य भरा इस घट में,
कोई कंकर मार इसे तोड़ गिरा दो,
रागों को बैरागी लेकर अब निकले,
बेसुरों से सब संगीत युहीं सजा दो,
कौवों को पहनाओं तमगे पुष्पहार,
कोयल को अब पत्थर मार भगा दो,
गिद्दों के संग खायो बैठ ये निरामिष,
ज्ञान हंसों को अब यहाँ से उड़ा दो,
रहने दो अब ये बालाएँ केवल नग्न,
इनके वस्त्र अब हरण कर बिखरा दो,
रोने दो अब भूखे मानव को बस ऐसे,
अन्नित खेतों पर अब कंक्रीट बिछा दो,
कहाँ क्रांति ला पाओगे अब तुम मित्रों,
बस मेरे ही विद्रोही स्वर को मिटा दो ....
===मन-वकील    

Monday, 10 October 2011


आँखों की देखी, कुछ मैं ऐसी देखी,
चाहे रही वो कुछ अटपटी अनदेखी,
पर सिखा गई मुझे वो सब मन देखी,
चित्रपट सी घटित हुई जो हम देखी,
दुर्भाग्य थी या आकस्मिक जो देखी,
अपनों संग विश्वास, भली भाँती देखी,
कड़वे नीम सी बीती जो और ने देखी,
इच्छा अनिच्छा के दौर में घूमे देखी,
मन की परतों पर चढ़ी धूल भी देखी,
कभी आँखों से बरसती वर्षा सी देखी,
कभी मन में रिसती नदी बनती देखी,
पीड़ा के उदगम में कही सिमटती देखी,
कभी नन्ही बेटी सी मुस्कराती भी देखी,
बहुत देखी अज़ब गज़ब सी होती यूँ देखी,
हाथों से रेत सी फिसलती जिन्दगी देखी ....
====मन-वकील

Friday, 7 October 2011

कुछ तस्वीरें आज भी है मेरे जेहन में,
जो कौंधती रहती है एक चमक के जैसे,
अब रुकता नहीं सिलसिला उन यादों का,
रह रह कर घटा सी गरजती हो कही जैसे,
यह समय की आंधी शायद सब कुछ उड़ादे,
पर साफ़ करेगी मन की धूल-परतों को, कैसे,
औंधे मुहँ रोने से भी नहीं छुपती यह आवाज,
चीखता जो है अब मेरा दिल,बार बार ऐसे,
अरे बदलते मौसम के संग अब तपिश भी गई,
जो कभी समेटे थी कभी उनको मेरे भीतर जैसे,
अब धुआं उठता रहता है बस एक लकीर बनके,
जहाँ जलते थे हमारे प्यार के अलाव से कैसे,
उठ मन-वकील ठिकाना ना बना, अब अपना
हर जगह,जब जिन्दगी हो इक सफ़र के जैसे....
==मन-वकील
कुछ तस्वीरें आज भी है मेरे जेहन में,
जो कौंधती रहती है एक चमक के जैसे,
अब रुकता नहीं सिलसिला उन यादों का,
रह रह कर घटा सी गरजती हो कही जैसे,
यह समय की आंधी शायद सब कुछ उड़ादे,
पर साफ़ करेगी मन की धूल-परतों को, कैसे,
औंधे मुहँ रोने से भी नहीं छुपती यह आवाज,
चीखता जो है अब मेरा दिल,बार बार जो ऐसे,
अरे बदलते मौसम के संग अब तपिश भी गई,
जो कभी समेटे थी कभी उनको मेरे भीतर जैसे,
अब धुआं उठता रहता है बस एक लकीर बनके,
जहाँ जलते थे हमारे प्यार का अलाव से कैसे,
उठ मन-वकील ठिकाना ना बना, अब अपना
हर जगह,जब जिन्दगी हो इक सफ़र के जैसे....
==मन-वकील

Saturday, 1 October 2011

इस वक्त की है अज़ब दास्ताँ,
ढूंढे नहीं मिलता कही आशियाँ,
रातों को चिरागों से रौशनी नहीं,
आंधियों का अब जोर चलता यहाँ,
फितरत ही बदलती,सभी और यूँ ,
गुनाहों का दौर अब चलता यहाँ,
दोस्ती नहीं,मिले तिजारती अक्स,
कीमत से मिलता प्यार हर जगह.....
==मन-वकील  

Sunday, 25 September 2011

प्रिये बेटी दिवस पर समस्त फोरम सद्स्यायों का स्नेह सादर सहित अभिनन्दन :
वो कभी माँ है बेटी है और बहन भी है ,
वो प्रेमिका है वो संगिनी जीवन भी है,
वो कई कई रूप में मेरे सामने है अवतरित,
वो मुझे मुक्त करदे ऐसा पापदहन भी है,
कभी शक्ति स्वरूपा, कभी एक बरगद है,
वो जो जननी पालिता है उसे नमन भी है////

Saturday, 24 September 2011

वो जो पेश करते है , अक्सर,
मेरे गीतों को अपने नाम देकर,
वो मेरे दोस्त थे साथ थे अकसर,
अब मुझे बेचते है इलज़ाम देकर.....
वो सिखाते रहे पल पल अक्सर,
चलाकियाँ,ज़माने का नाम लेकर,
अब तो सामने भौंकते,वो अक्सर,
वो जो हमारे पाले थे, रह रहकर,
मन-वकील, अब तो होता ये अक्सर,
आस्तीन में सांप से निकलते रहबर....