Saturday, 22 October 2011

मैं था रंगरेज़ के हाथों में इक कपडे जैसे,
थामे था जो मुझको,वो हुआ रंगने को ऐसे,
मैं जो पल में था हल्का, सफ़ेद बादल जैसे ,
अब युहीं गहरा हो गया, ना जाने क्यूँ  ऐसे,
मासूमियत मेरी वो,अब सिमट गई हो जैसे,
अब खुद की पहचान ढूंढ़गा,मैं खुद में कैसे,
भरी भीड़ में था डर,मैल छूने पे जो मुझे जैसे,
अब घटा से मुझमे छाई, कई दागों की ऐसे,
विवादों से परे रहकर, जो मैं जीया था ऐसे,
अब घिर गया हूँ उनमे,निकलूंगा बाहर कैसे ....
==मन-वकील
उसके जिस्म की आंच आने लगती है
जब भी वो बैठती है आकर संग मेरे,
खुशबू उसकी मुझे बहकाने लगती है
जब सिमट जाती है ऐसे पहलु में मेरे,
उसके बालों से उठती वो भीनी सी महक,
मैं भूल जाता जब लग जाती गले मेरे,
उसके होंठो पे आज भी है मेरे चूमने के निशां,
आज भी बसती है छुप के इस दिल में मेरे.....
==मन-वकील

Friday, 21 October 2011

गम से निजात कहाँ, अब चैन मिलता हमें अब कहाँ,
गंगा भी है अब सूखी,जो बहते खून के दरिया यहाँ वहां 
अरे जन्नत और जहन्नुम के फर्क को,ऐसे अब भूले हम,
तू क्या खुदा है, ना मिलने पे तेरे,फिर क्यूँकर करते गम,
नाराज़ है वो खुदा भी,जो मेरी बंदगी से भी नहीं है मानता,
मनाये किसे मन-वकील, रूठे खुदा को या तुझे, नहीं जानता
अरे दोस्तों को भुला कर, तेरी रौशनी को क्यूकर हम चाहे
गैरों की खाती हो तुम कसमें, फिर क्यूँकर ना तुझे भुलाए,
हम भूलने की चीज नहीं, खूब याद रख तू ऐ बेवफा सनम,
तुझे दिल से है मिटाया अब हमने, नहीं याद करते तुझे हम...
==मन-वकील

Wednesday, 19 October 2011

राम जैसे श्रेष्ट नहीं यदि कभी बन पाए,
लखन जैसे आज्ञाकारी बन दिखलायों,
अंहकार के रावण का यदि वध न होवे,
तो भीतर दुष्कर्मों का मेघनाद ही गिरायों,
क्या भस्म करते रहते हो?ऐसे हर वर्ष,
जब स्वयं की बैतरनी यदि पार ना पाओ,
यहाँ वहां बींधते रहते जब क्रोध के बाण,
तन चाहो क्यों उजला, जब मन हो श्मशान,
प्राण बसाकर ऐसे मन को जीवान्त कर,
मुग्ध स्वयं से हो, नव दिशा आत्म रचाओ,
===मन-वकील

Sunday, 16 October 2011

 प्रिये मित्र के लिए:-

कहने की बात थी वो उसे कहदी और सुना दी कब की,

जो दिल पे बन आई थी वो छुपाकर भी दिखा दी कब की, 
दुनिया की हवस में अपनी हस्ती ही मिटा दी कब की,
क्या कितना खोया अब दीन-ओ इबादत भुला दी कब की,
दिल लगाने की ऐसी सज़ा मिली, रूहे आतिश बुझा दी कब की,
अब नहीं फ़िक्र नहीं फनाह होने की, हर हसरत मिटा दी कब की,
काबे या इबादतगाह क्यूँकर जाए अब हम कभी, ऐ मेरे दोस्त,
जब इस दिल में उनके प्यार की वो मजार सजा दी कब की ,
एतिबार नहीं खोया खुद पे, ना खायी कभी भी झूठे कसमें हमने,
जब जहर-इ नफरत पीकर हर सुं, दीवानगी ऐसे लुटा दी कब की 
दफ़न कर दिए सब हुजूमे-गम भीतर, छुपाकर सभी हसरतें अपनी,
बस यार की राह तकते तकते, जिन्दगी अपनी लुटा दी कब की ....
==मन-वकील

Saturday, 15 October 2011

महतो जी की वो दालान आज भी है भरी हुई,
खाटों व् हुक्कों के बीच ज़रा कुछ फंसी सी हुई,
शामिल है चंद कुर्सियां भी सरकंडे से बुनी हुई,
कई महफ़िलों की दास्ताँ समेटे कुछ सुनी हुई
पर लोगों के हजूम आते यहाँ कुछ भी कहते
रात बीतने लगती और धीरे धीरे जाते रहते,
रंगीनियाँ बदल जाती रात के अँधेरे से डरी हुई
महतो जी की वो दालान फिर भी रहती भरी हुई,
मोंटू चाँद रमण नितिन या खान या हो कोमल
सभी शायद आते कभी ना कभी यहाँ पल दो पल,
चौपाल सी लगती पर है अलग से कुछ पसरी हुई
महतो जी की वो दालान सदा रहती आई है भरी हुई,
==मन-वकील

Wednesday, 12 October 2011


आज जब फिर से गुजरा,उस सड़क पर,
कई सालों बाद, जवानी के बीतते दौर में,
कुछ यादें झट से, समूचे मन में कौंध गयी,
वो सड़क नहीं बदली है आज भी वैसी ही,
जैसी पहले सी थी,मेरे कालेज के दिनों में,
वही गड्डे, वही बिखरे कंकर, उडती धूल,
कुछ नहीं बदला आज भी वैसा ही रहा है,
बदला है तो सिर्फ आस पास का माहौल,
वो अशोक के पेड़, जो ढांपे रहते थे इसे,
वो अब नहीं रहे, हाँ अब कंक्रीट के किनारे,
जो खा गए है उसके इर्दगिर्द की हरियाली,
संग में, कई नौजवानों के कुछ अरमान,  
मुझे याद है आज भी, वो बीते हुए कल,
जब मैं अपनी प्रेयसी की बिठाकर पीछे,
अपने पापा के उस स्कूटर पर, उन दिनों,
जानबूझकर निकलता था उसी सड़क पर,
और अचानक गड्डे में उछलता मेरा स्कूटर,
और वो कसकर थाम लेती मुझे बाहों से ,
और उसके उभारों की नरमी बस कर देती,
मेरी भीतर के रक्त को इतना गर्म और मस्त,
वो दिखने लगता मेरे कानों के लवों पर रेंगता,
और मन होता बस चुम्बन अंकित करने को,
वो मुझे डांटती,पर शायद कुछ और सोचती ,
वो उसके बाद और करीब हो जाती थी मेरे,
सड़क से गुजर जाने के बाद भी लिपटे हुए,
वो दिन शायद जीवन के सबसे सुखद दिन,
आज मैं फिर से गुजरा फिर उस सड़क पर,
वही गड्डे, लेकिन प्रेयसी अब साथ बैठी है,
साथ बगल की सीट पर, अब मेरे पीछे नहीं,
उसके हाथ मुझे घेरे नहीं है , बल्कि अब तो,
वो थामे है उसके उस मोबाइल को कसकर,
जो उसे मुझसे प्यारा लगता है और शायद हाँ,
पल में वो पल याद आते है मुझको सड़क पर,
क्या वो पापा का स्कूटर, ज्यादा सुखदायी था,
या फिर, मेरी यह बड़ी आरामदायक सी गाडी,
जो मुझे कर रही है वंचित उस क्षणिक सुख से,
इस सोच में डूबा मैं, अब भूलने लगा एकाएक,
सडक के गड्डे पर सिमटे अपने पुराने पलों को ...
==मन -वकील