Saturday, 22 October 2011

उसके जिस्म की आंच आने लगती है
जब भी वो बैठती है आकर संग मेरे,
खुशबू उसकी मुझे बहकाने लगती है
जब सिमट जाती है ऐसे पहलु में मेरे,
उसके बालों से उठती वो भीनी सी महक,
मैं भूल जाता जब लग जाती गले मेरे,
उसके होंठो पे आज भी है मेरे चूमने के निशां,
आज भी बसती है छुप के इस दिल में मेरे.....
==मन-वकील

No comments:

Post a Comment