Saturday, 15 October 2011

महतो जी की वो दालान आज भी है भरी हुई,
खाटों व् हुक्कों के बीच ज़रा कुछ फंसी सी हुई,
शामिल है चंद कुर्सियां भी सरकंडे से बुनी हुई,
कई महफ़िलों की दास्ताँ समेटे कुछ सुनी हुई
पर लोगों के हजूम आते यहाँ कुछ भी कहते
रात बीतने लगती और धीरे धीरे जाते रहते,
रंगीनियाँ बदल जाती रात के अँधेरे से डरी हुई
महतो जी की वो दालान फिर भी रहती भरी हुई,
मोंटू चाँद रमण नितिन या खान या हो कोमल
सभी शायद आते कभी ना कभी यहाँ पल दो पल,
चौपाल सी लगती पर है अलग से कुछ पसरी हुई
महतो जी की वो दालान सदा रहती आई है भरी हुई,
==मन-वकील

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