राम जैसे श्रेष्ट नहीं यदि कभी बन पाए,
लखन जैसे आज्ञाकारी बन दिखलायों,
अंहकार के रावण का यदि वध न होवे,
तो भीतर दुष्कर्मों का मेघनाद ही गिरायों,
क्या भस्म करते रहते हो?ऐसे हर वर्ष,
जब स्वयं की बैतरनी यदि पार ना पाओ,
यहाँ वहां बींधते रहते जब क्रोध के बाण,
तन चाहो क्यों उजला, जब मन हो श्मशान,
प्राण बसाकर ऐसे मन को जीवान्त कर,
मुग्ध स्वयं से हो, नव दिशा आत्म रचाओ,
===मन-वकील
लखन जैसे आज्ञाकारी बन दिखलायों,
अंहकार के रावण का यदि वध न होवे,
तो भीतर दुष्कर्मों का मेघनाद ही गिरायों,
क्या भस्म करते रहते हो?ऐसे हर वर्ष,
जब स्वयं की बैतरनी यदि पार ना पाओ,
यहाँ वहां बींधते रहते जब क्रोध के बाण,
तन चाहो क्यों उजला, जब मन हो श्मशान,
प्राण बसाकर ऐसे मन को जीवान्त कर,
मुग्ध स्वयं से हो, नव दिशा आत्म रचाओ,
===मन-वकील
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