Sunday, 14 August 2011

मैं अभिशप्त नहीं हूँ

मेरी देह पर उनके रेंगते हुए हाथ,
आज भी भय से सिरहन दौड़ जाती,
कितनी बार उठ बैठती हूँ मैं रात रात,
और वो वीभत्स हंसी ठहाके सुनाई देते,
वो पीड़ा का अहसास मेरे भीतर जागता,
और शरीर के दर्द से ज्यादा मन में पीड़ा,
रोष भी शायद अब अश्रु बन के निकलता,
कुछ कहना चाहती हूँ मैं चीख चीख कर,
इस खोखले समाज के निर्जीव जीवों से,
किन्तु यह क्रंदन तो तब कर चुकी थी मैं,
जब मेरी देह को रेत की तरह रोंदा गया,
अब तो केवल चिन्ह शेष बचे है घावों से ,
और मैं अभिशिप्त हो गयी हूँ बिना दोष के,
बलात्कार मेरी देह से नहीं हुआ था केवल,
संग मेरे भीतर की आत्मा को भी रोंदा गया,
और एक ख़ामोशी आकर अब बस गयी,
ना जाने कहाँ से मेरे भ्रमित अस्तित्व पर,
और मैं ढूंढ़ रही हूँ, अपनी खोयी अस्मिता को,
इधर उधर सब जगह, इस निरीह संसार में ,,,,,
==मन वकील

 

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