Sunday, 14 August 2011

अगर जिया हूँ यहाँ मैं,
तो डरपोक बनकर ऐसे,
कोई बात मुहँ पे कह दूँ,
इतनी हिम्मत हो कैसे,
सच बोलने पर मिलती
यहाँ सिर्फ पत्थरों से सज़ा,
झूठी तारीफों और चापलूसी ,
दिलवाती है यहाँ रौनक-मज़ा,
मैं कोई ईसा या गाँधी नहीं हूँ,
लाऊं बदलाव ऐसी आंधी नहीं हूँ ,
मुझे जीना है यहाँ अभी और,
चाहे ला दूँ झूठों के कही दौर ,   
मुझे नहीं बनना यहाँ सत्यवादी ,
रहने दो मुझे गुलाम, नहीं चाहिए आज़ादी....
===मन-वकील

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