मन की कही, और मन ने ही ना जानी,
मन सो डरे, और मन की सुने कटु बानी,
मन सो ढूंढे,और मन में बसी वो अनजानी,
मन को मारे, और मन की सुनाये कहानी,
मन में बसे, और मन की तोड़े आस पुरानी,
मन में उड़े, और मन की ना थाह पहचानी,
मन सो खाए,और मन की कब क्षुधा मिटानी,
मन में व्यापे,और मन में काल-कोठरी बनानी,
मन का बैरी, और मन का मोह बने जो ज्ञानी,
मन से ना लिखे, मन-वकील अब निपट अज्ञानी .......
मन सो डरे, और मन की सुने कटु बानी,
मन सो ढूंढे,और मन में बसी वो अनजानी,
मन को मारे, और मन की सुनाये कहानी,
मन में बसे, और मन की तोड़े आस पुरानी,
मन में उड़े, और मन की ना थाह पहचानी,
मन सो खाए,और मन की कब क्षुधा मिटानी,
मन में व्यापे,और मन में काल-कोठरी बनानी,
मन का बैरी, और मन का मोह बने जो ज्ञानी,
मन से ना लिखे, मन-वकील अब निपट अज्ञानी .......
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