उधेड़बुन उधेड़बुन , ना जाने कैसी कशमकश है?,
कहीं कोई धागे का सिरा, हाथों में आकर अचानक,
छूट जाता है, बस मैं लगा रहता जोड़ने की कोशिश,
तमाम सवाल ना जाने कहाँ से, एकाएक यूँ आकर,
बस गए है मेरे गहराए जाते हुए,बेशक्ल दिमाग में,
जैसे कुछ अनजाने लोग,एक मकान में किराएदार से,
दिन भर की चिल्ल-पौ, अब रातों में फैलाती है पाँव,
सन्नाटा तो है वहां,पर किसी शहतीर में दबा सा हुआ,
पसरने आया होगा, सोचते हुए किसी पल के बारे में,
और भागदौड़ की आहट सुन,चुपचाप हो गया शायद,
और कहीं छुपने की चाह में,बस दब के रह गया बेचारा,
सवाल तो आ बसे, पर जवाबों की राह रोके रहते हमेशा,
कितना भी धकेल लें, ये किवाड़ दिमाग को खोलने को,
पर ठसाठस जमे सवाल, रत्ती भर जगह नहीं छोड़ते,
अब तो धूल की परतें, नहीं जमती कहीं से आकर भी,
दिमाग में बनी हुई, उन पुरानी यादों की दीवारों पर,
तो कैसे भुला सकता हूँ मैं, वो गुज़रे हुए मीठे पल,
और संग में साँपों से रेंगते,नागों से डसते हर पल,
वो नाशुक्रियत से बहे, बेईज्जती के कसे अहसास,
बस कुरेदते है मुझे, दिखा दिखा कर डरावनी शक्लें,
क्योकि अभी दिमाग में, उनकी दीवारे बिना ढंके है,
नयापन, नए रिश्ते, कुछ ख़ुशी नहीं देतें अब मुझे,
बस देते है तो,इक डर, एक खौफ, जो एक रंग सा,
फिर पुत जायेगा,नयी परत बना यादों की दीवारों पर,
मैं थक गया हूँ अब, पथराई आँखें और सूखें होंठ,
कुछ कहना चाहते है, चीख चीख कर सबसे, सबसे,
फिर शुरू हो जाती है, वही उधेड़बुन, वही कशमकश ....
===मन वकील
कहीं कोई धागे का सिरा, हाथों में आकर अचानक,
छूट जाता है, बस मैं लगा रहता जोड़ने की कोशिश,
तमाम सवाल ना जाने कहाँ से, एकाएक यूँ आकर,
बस गए है मेरे गहराए जाते हुए,बेशक्ल दिमाग में,
जैसे कुछ अनजाने लोग,एक मकान में किराएदार से,
दिन भर की चिल्ल-पौ, अब रातों में फैलाती है पाँव,
सन्नाटा तो है वहां,पर किसी शहतीर में दबा सा हुआ,
पसरने आया होगा, सोचते हुए किसी पल के बारे में,
और भागदौड़ की आहट सुन,चुपचाप हो गया शायद,
और कहीं छुपने की चाह में,बस दब के रह गया बेचारा,
सवाल तो आ बसे, पर जवाबों की राह रोके रहते हमेशा,
कितना भी धकेल लें, ये किवाड़ दिमाग को खोलने को,
पर ठसाठस जमे सवाल, रत्ती भर जगह नहीं छोड़ते,
अब तो धूल की परतें, नहीं जमती कहीं से आकर भी,
दिमाग में बनी हुई, उन पुरानी यादों की दीवारों पर,
तो कैसे भुला सकता हूँ मैं, वो गुज़रे हुए मीठे पल,
और संग में साँपों से रेंगते,नागों से डसते हर पल,
वो नाशुक्रियत से बहे, बेईज्जती के कसे अहसास,
बस कुरेदते है मुझे, दिखा दिखा कर डरावनी शक्लें,
क्योकि अभी दिमाग में, उनकी दीवारे बिना ढंके है,
नयापन, नए रिश्ते, कुछ ख़ुशी नहीं देतें अब मुझे,
बस देते है तो,इक डर, एक खौफ, जो एक रंग सा,
फिर पुत जायेगा,नयी परत बना यादों की दीवारों पर,
मैं थक गया हूँ अब, पथराई आँखें और सूखें होंठ,
कुछ कहना चाहते है, चीख चीख कर सबसे, सबसे,
फिर शुरू हो जाती है, वही उधेड़बुन, वही कशमकश ....
===मन वकील
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