Sunday, 13 May 2012

"माँ,मेरे जीवन का बटवृक्ष हो"

        

ओह माँ ! तुम मेरे जीवन का बटवृक्ष हो,

मेरे अंकुरण से मेरे विकास का आधार हो, तुम
अपनी कोख में सहेज कर मुझे सींचती,
मेरे भीतर रक्त सहित गुणों का संचय करती,
मेरे भीतर अपने सदगुण व् अवयव भरती,
मुझे पीड़ा से मुक्त रख, स्वयं पीड़ा सहती,
बाह्य जगत में मेरे अवतरण का आधार हो, तुम
ओह माँ ! तुम मेरे जीवन का बटवृक्ष हो,
मेरे नन्हे पैरों में गति का वो संचरण करती,
मेरे अधरों में मीठे मीठे बोल भी तुम भरती,
मेरे तन को अपने रक्त अवयव से सींचे रहती,
स्वयं को भुला कर सदा मेरी सुध में खोयी रहती,
मेरे जीवन के अबोध पलों का अदभुद संसार हो, तुम
 ओह माँ ! तुम मेरे जीवन का बटवृक्ष हो,
मेरी शिक्षा का तुम हो प्रथम अन्वेषण-शाळा,
मेरी बुद्धि की सम्यक सहज शब्दों की कंठमाला,
संसार सुलभ नियमों का अनुपालन मुझसे करती,
कही भटक न जाऊं जीवन में, तुम इस भय से डरती,
मेरे सामाजिक नियमों में ढलने का एक आधार हो, तुम
ओह माँ ! तुम मेरे जीवन का बटवृक्ष हो,
मेरे मनसा की गति को तुम ही रही पहचानती,
मेरे जीवन के बदलाव को तुम ही रही मानती,
मेरे मन के गतिरोधों को रही तुम सदैव विरोध,
मेरे भीतर उत्पन्न अंधेरों को करती तुम अवरोध,
मेरे जीवन के पथ पर अनुशासन का मूलाधार हो, तुम
ओह माँ ! तुम मेरे जीवन का बटवृक्ष हो,
क्या क्या कहूँ ? समस्त शब्द पड़े इस व्याख्या से भी छोटे,
मेरी सुरक्षा,मेरे विकास में, तुम ही सहती जीवन में चोटें,
मेरे गुणों और अवगुणों का बनकर सदा एक माप दंड,
यदा कदा मैं कहीं भटका, तुम ही देती रही सुधार-दंड,
ईश्वर को नहीं जानती, पर ईश्वर का एक अवतार हो, तुम
ओह माँ ! तुम मेरे जीवन का बटवृक्ष हो,
==मन वकील

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