Saturday, 19 May 2012

सत्यमेव जयते( भाग - एक)
सत्यमेव जयते, हाँ मैंने देखा है,उस कचेहरी में ,
जहाँ न्याय बैठा है अँधा होकर, आँखों से अँधा,
बहरा भी हो गया है, तभी तो न्याय नहीं सुनता,
किसी निर्धन की व्यथा,ना ही देख पाता अन्याय,
सत्यमेव जयते, हाँ मैंने देखा है,उस कचेहरी में ,
जहाँ धनी झट से,नियत तिथि से निवृत होकर,
कुरते की सिलवटें झाड़ता, बाहर निकल जाता,
न्यायालय के कमरे से, पेशकार को खरीद कर,
और निर्धन सिर्फ करता, प्रतीक्षा अपनी पुकार की,
और फिर भीतर जाकर, सुनता डांट फटकार बस,
कभी जज से, कभी पेशकार से या फिर नायब से,
सत्यमेव जयते, हाँ मैंने देखा है,उस कचेहरी में ,
जहाँ वो बुढ़िया,अपने हाथों में कुचला कागज़ लिए,
बस आस लगाए बैठी अपने बेटे के आने की, परेशान,
जो कल रात से, ना जाने क्यों, है पुलिस का मेहमान,
पुलिस ने कल रात, एक साथ कई केसों को किया हल,
तभी तो बुढ़िया का निर्दोष बेटा, भुगतेगा कर्मों का फल,
सत्यमेव जयते, हाँ मैंने देखा है,उस कचेहरी में ,
जहाँ कुछ अधिवक्ता,वकालत के असूलों से नहीं जुड़े,
जिनका ईमान है पैसा,चाहे उनकी बहस कहीं भी मुड़े,
इन्साफ को भुला,विरोधी से मिला लेते है वो हाथ,
जिरह न कर, खुद देने लगते है विरोधी का ही साथ,
सत्यमेव जयते, हाँ मैंने देखा है,उस कचेहरी में ,
जहाँ फाइलों का गम होना, अब आम सी ही है बात,
जजों के घर अब महफ़िल जमती,खरीदारों की सारी रात,
जहाँ फैसले इलम और इन्साफ से नहीं,मोल से बनते,
जहाँ मकानों के ठेकेदार,अब मासूम किरायेदारों पर तनते
सत्यमेव जयते, हाँ मैंने देखा है,उस कचेहरी में ,
एक पटल पर अब बस लिखा रह गया है बनकर एक नारा,
सत्यमेव जयते से अब, न्याय की देवी ने कर लिया किनारा .......
==मन वकील
 

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