Wednesday, 4 September 2013

मेहमान है जवानी


अपने बुढ़ापे को छुपाने का वो अज़ब ही तोड़ निकालता है,
सफ़ेद बालों को हटाने के लिए अपनी खाल छील डालता है,

उम्रदराज होने का खौफ, ऊपर से परेशानियां कम नहीं होती 
उसके चेहरे की झुरियाँ कमबख्त फिर भी कम नही होती,
ना जाने कैसे कैसे से केमिकल चेहरे पर वो यूँ डालता है,
अपने बुढ़ापे को छुपाने का वो अज़ब ही तोड़ निकालता है,

जब भी निकलता है चाहे भरे बाज़ार या किसी भी राह पर,
हसरतें खूबसूरती को देखें,लगाम ना पडती उसकी चाह पर,
अंकल अंकल की पुकार अनसुनी कर,रंगी जुल्फे संवारता है,
अपने बुढ़ापे को छुपाने का वो अज़ब ही तोड़ निकालता है,

कमबख्त दिल है उसका, जो अब भी बन्दर सा यूँ उछलता,
खिज़ाब से रंगे मूँछे ,संग में सिर के बालो पर कालिख मलता,
सफ़ेद होती भौंवो पर भी, अब वो कैंची से यूँ धार सी डालता है, 
अपने बुढ़ापे को छुपाने का वो अज़ब ही तोड़ निकालता है,

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