Wednesday, 11 September 2013


लोग युहीं हम पर शक किया करते,
हम ना कातिल है ना कोई दहशतगर्द,
चेहरे पढ़ लेते है शायद,किसी हद तक,
रूहानियत से हमारी होता क्यूँ उन्हें दर्द,
पहचान हमारी अब खुद में ही सिमटती,
लानतें करने लगी मेरे गर्म लहू को सर्द,
हमसे ना मिल ऐ दोस्त, जो हो कोई डर,
हम भी घर में रहते नहीं कोई आवारागर्द।।
==मन वकील  

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