Monday, 12 November 2012

कब मानेगी निर्धन के घर में दीवाली,

  नमन सर्वप्रथम है उस प्रथमेश को,
  जो रिद्धि सिद्धि व् समृद्धि के दाता है,
  नमन उस मातेश्वरी लक्ष्मी को भी,
  जिसके आने से वैभव सुख आता है ,
  भरे है दीप घी से,होते है ज्योतिर्मय
  नमन जगदीश को,करता मैं विनय,
  प्रभु, अब समस्त दुखों को विराम दो,
  निरीह मेहनतकशों को भी आराम दो,
  क्यों सोते है वो रात्रि में बिना भोजन,
  पेट में जब क्षुधा तो कैसे शांत हो मन,
  प्रभु क्यों कलयुग में भ्रष्टाचारी हो सुखी,
  क्यों न्यायवादी मानव रहता यहाँ दुखी,
  क्यों तेरे इस जग में तन पर नही वसन,
  जो सभी पाप देख भीगते है तेरे भी नयन,
  कहाँ अब तेरा नाम जब फैले है आडम्बर,
  अब तेरे दर्शन को भी नहीं आता मेरा नंबर,
  कहाँ छुप के बैठा है प्रभु, जग का माली,
  बता कब मानेगी निर्धन के घर में दीवाली,
====मन वकील


 
   चमकते हुए सितारों की वो भरी थाली, 
    आज घर की मुंडेर पर मैंने है सजाई,
    तमस को मिटा कर प्रकाशित कर,
    मेरे घर वो दमकती दिवाली है आई,
    कभी छत से उड़ते रौशनी के राकेट,
    सड़क पर वो पटाखों के लड़ी है जलाई,
    सजी हुई दुकानों से बाज़ार की रौनक,
    चेहरों पर ख़ुशी लेकर वो भीड़ है आई,
    चमकते हुए सितारों की वो भरी थाली, 
     आज घर की मुंडेर पर मैंने है सजाई,
     कहाँ वो अमावस अब है ना रात सूनी,
     आतिशबाज़ियो का शोर देता है सुनाई,
     मेहमानों का वो यूँ आना नहीं है बोझ,
     आये वो संग मुस्कराहट के बँटे है मिठाई,
    नए पहनावों से अब नयी शान है दिखती,
    क्या बालक क्या बूढ़ा सभी नये लगे है भाई
    चमकते हुए सितारों की वो भरी थाली, 
     आज घर की मुंडेर पर मैंने है सजाई,
====मन वकील





   

Saturday, 10 November 2012

ओम जय पत्नी मैया स्वामिनी पत्नी मैया,
तुमको निशदिन सेवत तुमको सदा ध्यावत
तुम्हारी ननदों का यह भैया, ॐ जय पत्नी मैया,
तुम ही घर की महारानी तुम ही घर के कर्ता धर्ता ,
तुमसे से सब भय खाते तुमसे हर कोई घर में डरता,
तुम ही डुबो दो किसी की भी नैया, ओम जय पत्नी मैया,
तुम हो रूप प्रचंडा तुम ही सर्व वधिनी क्रोध धारिणी,
क्षमा तुम्ही देती तुम ही पति की भव सागार तारिणी,
तुम ही कर दो किसी को भी हैया, ओम जय पत्नी मैया,
तुम जब होय प्रसन्न घर में आनंद मंगल कारज होवे,
जो तुम भयी रुष्टा वो पति बैठ बैठ रक्त अश्रु से रोये,
तुमरे समक्ष क्या शनि की भी ढैया, ओम जय पत्नी मैया,
बंधू बांधव सब तुमसे डरते सास ससुर शक्ति हीन भये,
दहेज़ पीड़ित कब बन जाओ,कौन पुलिस की मार सहे,
कोर्ट में चक्कर लगा करे पति हाय-दैय्या , ओम जय पत्नी मैया
जो पति अपनी भार्या के गुणगान गावे, सदा सुखी भोजन पावे,
चाहे जोरू का गुलाम कहलावे,पर सेज पर रात्री बिताये ,
आनंद मंगल जीवन से चले गृहस्थी की नैया, ओम जय पत्नी मैया ....
==मन वकील 

Wednesday, 7 November 2012

था मेरे आँगन में भी एक पैसों वाला पेड़
जहाँ से गिरते रहते थे रोज़ पैसों के ढेर,
लगते थे जहाँ पैसे से उम्मीदों वाले फल,
हर काम आज ही होता था न पडती कल,
खुशियों की पैरवी करते सुविधा साधन,
नाच नाच मयूर हो उठता था मेरा मन,
कभी सावन था और कभी रहता बसंत,
नित नए पकवान दावतों का नहीं अंत,
कभी पहाड़ों की सैर कभी समुद्र मंथन,
रोज़ बैंक के चक्कर लगा जोड़ते थे धन,
फिर अचानक वो पेड़ को लग गयी नज़र,
धीरे धीरे होने लगा उसपर सूखे का असर,
पत्ते अब रोज़ नहीं लगते उसकी डाल पर,
मेहनत का पसीना भी होने लगा बेअसर,
अब वो पेड़ लगा झुलसने हो कर बर्बाद,
कहाँ से देता मैं उसमे बेईमानी की खाद,
इक दिन आया वो पेड़ बन गया था ठूँठ,
मैं खामोश था पीकर बदकिस्मती का घूंट,
भ्रष्टाचार का कीड़ा मेरे पेड़ की जड़े खा गया,
मन-वकील तू अब देख कैसा समय आ गया ....
==मन वकील     

Wednesday, 31 October 2012

ओम जय पत्नी दैया ओम जय देवी पत्नी हईया,
तुमको निशदिन पूजत तुमरी ननदों का भैया,
चाहे लव मेरिज से आओ,या घरवालों के कहने,
तुम कब्ज़ा ही लेती अपनी माँ और सास के गहने,
तुम से ही घर की शोभा सब घर में तुमसे डरते,
मुझ नर की क्या हिम्मत माँ बापू भी तुमसे डरते,
कब तुम भेजो दुखसागर में,अपने ही निरीह सैया
 ओम जय पत्नी दैया ओम जय देवी पत्नी हईया,
तुम जब खुश होती,तब घर में भोग पकवान मिले,
जब तुम होती रुष्ट,तो पति के लंगोट तक होते गीले,
तुम से कोई पार ना पाए, तुम हो घर में पति त्राता,
त्राहि माम करकर,नर आगे तुमरे अपनी पूँछ हिलाता,
देवर में सब दोष निकालो, भाये सदा अपना ही भैया, 
ओम जय पत्नी दैया ओम जय देवी पत्नी हईया,
तुम घर की महरानी, पर घर में महराजा कौन बने
 एकछत्र राज्य चलाती, तुमरे रोब  के आगे कौन तने,
पति कमाए जितना भी, तुम सब ही अपने पास रखती,
जो कुछ माँ को देवे, क्रोध से भस्म क्र देती उसकी माँ-भक्ति
घर में सब तुमसे चलता,ज्यो चले काल का बड़ा पहिया
ओम जय पत्नी दैया ओम जय देवी पत्नी हईया,
जो नर अपनी भार्या के आगे, नित नतमस्तक होता,
रात्रि आनंद भोगता, चैन से अपने कमरे में ही सोता,
जो नर बने दबंगा, कर देती भरे बाज़ार उसे वो नंगा,
चाहे तन पर हो कपडे, पर तमाशा बने भीड़ में बेढंगा,
सपरिवार कोर्ट के फेरे लगाता, जेब से निकले जाए रुपैया
ओम जय पत्नी दैया ओम जय देवी पत्नी हईया,
====नमन है वन्दनीय भार्या को ............

Monday, 29 October 2012

भाग्य यदि लिखा होता किसी कागज़ पर,
तो शायद किताबसाज़ नसीबवाला होता,
या फिर जो लिखता "पाती" वो खुद लिखता,
मैं भी लिखवाता अपना भाग्य अनोखे सा,
और तुम से मेल कराता जोड़ उन लकीरों को,
फिर शायद हम मिलते उस ऊँचें चाँद पर,
भाग्य यदि लिखा होता किसी कागज़ पर,
मैं भी औडे रहता मखमली से वो दुशाले,
तुम को भी पहनता गहने वो नीले रत्नों वाले,
चिरयौवना कर देता तुम्हे मैं, लिख वो "पाति"
मैं बन वीर पुरुष तुम भोगती जो मुझे पाती,
रखता तुम्हे ह्रदय में, जो सोती सोने के सेज पर ,
भाग्य यदि लिखा होता किसी कागज़ पर,
===मन वकील

Saturday, 27 October 2012

मैं हूँ तो हूँ ? कैसे कह दूँ नहीं हूँ

मैं हूँ तो हूँ ? कैसे कह दूँ नहीं हूँ
शब्दों के बिछे माया जाल सा,
रूठ कर बैठे प्रतीक्षित काल सा,
कहीं अचानक आये अँधेरे सा,
कभी चिंताओं के कोई घेरे सा,
मैं हूँ तो हूँ ? कैसे कह दूँ नहीं हूँ ,
कभी प्रेयसी के नेत्रों में आस सा,
कभी नभ पर बादल की प्यास सा
कही बसा हूँ आग के जलते ढेर सा,
कभी अचानक ही भौर सवेर सा,
मैं हूँ तो हूँ ? कैसे कह दूँ नहीं हूँ
कभी सूखते हुए ताल के तल सा,
कहीं पत्तियों के चेहरे पर जल सा,
कभी क्रंदन करता हूँ कभी वंदन सा,
कभी प्रौढ़ अनुभवी,कभी बाल नंदन सा,
मैं हूँ तो हूँ ? कैसे कह दूँ नहीं हूँ