Saturday, 27 October 2012

मैं हूँ तो हूँ ? कैसे कह दूँ नहीं हूँ

मैं हूँ तो हूँ ? कैसे कह दूँ नहीं हूँ
शब्दों के बिछे माया जाल सा,
रूठ कर बैठे प्रतीक्षित काल सा,
कहीं अचानक आये अँधेरे सा,
कभी चिंताओं के कोई घेरे सा,
मैं हूँ तो हूँ ? कैसे कह दूँ नहीं हूँ ,
कभी प्रेयसी के नेत्रों में आस सा,
कभी नभ पर बादल की प्यास सा
कही बसा हूँ आग के जलते ढेर सा,
कभी अचानक ही भौर सवेर सा,
मैं हूँ तो हूँ ? कैसे कह दूँ नहीं हूँ
कभी सूखते हुए ताल के तल सा,
कहीं पत्तियों के चेहरे पर जल सा,
कभी क्रंदन करता हूँ कभी वंदन सा,
कभी प्रौढ़ अनुभवी,कभी बाल नंदन सा,
मैं हूँ तो हूँ ? कैसे कह दूँ नहीं हूँ

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