Saturday, 8 December 2012

 प्रिये  मित्र  ग्रुप जी के हस्ताक्षर में जड़ा हुआ है ;- " सांस लेने में तकलीफ हो रही है "

    दौर है कुछ अजीब सा , इस अहले चमन में,
   हवाओं में अब तो वो ताजगी भी नहीं होती,
   धुआं है कालिख सी भरे हुआ इस फिजा में,
    घुटन सी फैली इक चादर सी बन सो रही है,
    इस शहर में सांस लेने में तकलीफ हो रही है,
    परिंदों के वो झुण्ड जो उड़ते थे आसमान में,
    वो ना जाने जाकर, कहाँ बस गये कब से, 
    सुबह लाती है मेरी चादर पर ऐसी रोशनाई,
    मलमल के उस चादर को मेरी बीवी धो रही है,
    इस शहर में सांस लेने में तकलीफ हो रही है,
    मुरझाये चेहरे से अब नजर आते हर तरफ,
    सूखे होंठे पर अब मुस्कराहट भी नहीं फैली,
    गहरे गड्डों से झांकती वो सुर्ख सी घूरती नजरे,
    अब तो सहमे सहमे आंसुओं की बाट जो रही है,
    इस शहर में सांस लेने में तकलीफ हो रही है ...
===मन वकील   
       जिन्दगी तो अपनी बेमिसाल है ,
        पर इसमें कुछ तो मलाल है,
       आहटें ही कुछ जानी पहचानी,
       सुगबुगाहट होती है अनजानी,
       तपिश सी मन में वो आ बसी,
       यादों में वही चुभन सी है फंसी,
       आंसुओं में दिखता वो  कमाल है,
       जिन्दगी तो अपनी बेमिसाल है ,
        पर इसमें कुछ तो मलाल है 
       हलचल भी है, कुछ तो है ग़दर,
       खामोशियों का भी होता है असर,
       चंद ख्वाईशें,कुछ टूटे अरमान है,
       कहीं खो सी गयी मेरी पहचान है 
      हर शख्स को क्यों मुझसे सवाल है,
      जिन्दगी तो अपनी बेमिसाल है ,
       पर इसमें कुछ तो मलाल है,    
       अब मुझ पर लगे,वो कई दाग है,
      दिल में जलती बदले की वो आग है,
       खुद को जलाती है जो ऐसे मुझे,
      कैसे बरसे बारिश जो कुछ तो बुझे,
      गर्दिशों में फिरते परिंदे सा हाल है 
     जिन्दगी फिर भी अपनी बेमिसाल है 
     पर इसमें भी कुछ मलाल है ...

===मन वकील 
     
 
 

Thursday, 6 December 2012



         जब थी मेरे गुड्डे गुडिया से खेलने की उम्र,
        तब माँ बापू तुमने क्यो मेरा ब्याह रचाया?
       क्यों अपनी जिद को समाजिकता मान कर,
       मुझे गुड्डे गुडिया सा बना मेरा लगन जुटाया,
       ऐसी बापू , बतलाओ तुमे क्या थी मजबूरी?
      क्यों ना मानते तुम, मेरी शिक्षा भी थी जरुरी,
      माँ, तुम ही बतलाओ मुझे क्यों ऐसे है रुलाया?
       जब थी मेरे गुड्डे गुडिया से खेलने की उम्र,
        तब माँ बापू तुमने क्यो मेरा ब्याह रचाया?
      क्या घर में मेरे लिए ना था आँगन वो औसरा,
      क्यों मुझे तुमने कोख में अपनी ऐसे था धरा,
      बापू ,क्यों मुझ अबोध से तुम्हे प्रेम लाड नहीं,
     क्यों माँ, तुम भी मानो बापू की हर बात सही,
    बतलाओ बापू, क्यों मुझसे मेरा बचपन है छुड़ाया,
            जब थी मेरे गुड्डे गुडिया से खेलने की उम्र,
        तब माँ बापू तुमने क्यो मेरा ब्याह रचाया? 
===मन वकील 


       लो भाइयों , फिर वही समय है वापिस आया,
       फिर से ईस्ट इंडिया कंपनी ने बिगुल बजाया,
       आने वाले है हम फिर से इस भारत को खांटने,
       जाने से पहले इसे फिर कई हिस्सों में यूँ बांटने,
       अब हम 300 वर्ष से अधिक यहाँ पर राज करेंगे,
       फिर से अपनी फिरंगी शान-शौकत को भरेंगे, 
       हमारी मेहनत फिर से ही देखो रंग है यहाँ लाई,
       65 वर्षों बाद खायेंगे हम फिर से यहाँ खूब मलाई,
      काले पीले नेताओं ने फिर से हमारा दामन थामा,
      हमारी काली फितरत को पहनाया संसद में जामा,
      जिन्होंने ने कभी था हमें यहाँ से धक्के मार भगाया,
     उनकी जयचंद जैसी औलादों ने हाथ जोड़ हमें बुलाया,
     हमारी गौरी बेटी ने जो तुम्हे ऐसा सबक है सिखाया,
    गहरी गहरी चालें चल कर काले नेताओं को फुसलाया,
    देश की तरक्की के नाम पर अब चलेगा हमारा ही जोर ,
    अरे खोखले लोगों का यह भारत रहेगा फिर से कमज़ोर,
    ऍफ़ डी आई के नाम पर अब फिर से हम तुम्हे लूटेंगे, 
    फिर से भारत में स्वतंत्रता के भाग्य रो रो कर फूटेंगे .....
===========सबक लो मित्रों 
    

Tuesday, 20 November 2012

 सी लो जुबान अब कुछ बोलो नहीं भाई 
 अब मुल्क में ना प्रजातंत्र ना लोकशाई, 
 बँटे है क्षेत्र अब छोटी छोटी रियासतों में,
 राज्य भी अब बन गये रजवाड़े घटों में, 
 प्रजा है , संग में है नेताओं की राजशाई,
 सल्तनतें बना खाए जाए ये दूध मलाई, 
सी लो जुबान अब कुछ बोलो नहीं भाई,
अब मुल्क में ना प्रजातंत्र ना लोकशाई, 
मरे आम आदमी ना कोई गम ना शोक,
नेताजी के मरने से सड़कों पर लगे रोक, 
जनता को मरने पर ना शमशान ना कब्र,
नेताजी के मरने पर चमचों का टूटे सब्र,
नेता के शोक जलूस में हडकंप मचे भाई,
जो खुली देखी दूकान, झट से आग लगाई 
सी लो जुबान अब कुछ बोलो नहीं भाई,
अब मुल्क में ना प्रजातंत्र ना लोकशाई,  
खेल मैदानों पर बनती नेता की समाधि 
कौतुहल देखने आई भीड़ करती है बर्बादी 
मत लिखो मत बोलो नहीं यहाँ आज़ादी,
जाओगे जेल बेसाख्ता,बढाने वहां आबादी,
क्यों लिखते,मत बोलो,आँखें मीच लो भाई,
गाँधीजी ने हमें तीन बंदरों की सीख पढ़ाई,
सी लो जुबान अब कुछ बोलो नहीं भाई,
 अब मुल्क में ना प्रजातंत्र ना लोकशाई,  
==मन वकील 

Monday, 19 November 2012

कभी ढूंढ़ता फिरता है, वो इक अक्स, 
जो ना हो उस जैसा,पर उससे ही उभरे  
ना हो रंग साफ़ पर स्यामल से निखरे 
आड़ी तिरछी लकीरों से जरा सा हटकर,
कुछ सपनों में घुलमिल या फिर बँटकर, 
आसमानी रंगों की कुछ हो रंगत समेटे,
कभी लताओं में खुद तन को वो लपेटे, 
चांदनी की ठंडक ले कभी सूरज का गर्मी,
कभी सख्त हो उभरे कभी बसाए नरमी,
अन्तर्वासना के जल से भी भरकर निकले,
सौन्दर्य की तपिश से जरा सा वो पिघले,
कुछ ऐसी उम्मीदों से घिरा है वो इक शख्स,
कभी  ढूंढता फिरता है वो एक अक्स।।
==मन वकील 

Wednesday, 14 November 2012

           
  कैसा यह बालदिवस है?
     जब मासूम चेहरे पर छाई हो भूख की चादर,
    वो टेबल पोंछते नन्हे मासूम झेलते अनादर,
    नन्हे हाथ जो बीनते है गलियों में कूड़े के ढेर,
    चेहरे में मासूमियत के जगह कालिख अँधेर,
    क्रूर हाथो से झेलता जो नित नयी सी हवस है,
    सड़कों पर रोता फिरता,कैसा यह बाल दिवस है,
    कभी बंद कमरों में झेलता फिरता है घूंसे लातें,
    कभी झूठे बर्तनों से बैठ कर दुःख अपने है बांटे,
    कभी चौराहों पर गुब्बारे बेचे,कमाए चंद सिक्के,
    कभी मंदिरों में, लंगरों में भूख में बस खाए धक्के,
    पैदा हुआ तो शायद था उजाला, अब वो तमस है,
   
सड़कों पर रोता फिरता,कैसा यह बाल दिवस है,
    अखबारों के इश्तिहारों में वो चंद मुस्कराहट भरी,
    नेताओं की तस्वीरों के नीचे वो नन्ही बालिका खड़ी,
    इन बंटते वजीफों का अब हकदार कौन है भाई,
    सरकारी बाबू और अध्यापकों से कैसी लूट मचाई,
    सरकारी अनुदान अब मिटाते किस की वो हवस है
     सड़कों पर रोता फिरता,कैसा यह बाल दिवस है,   
     ===मन वकील