प्रिये मित्र ग्रुप जी के हस्ताक्षर में जड़ा हुआ है ;- " सांस लेने में तकलीफ हो रही है "
दौर है कुछ अजीब सा , इस अहले चमन में,
हवाओं में अब तो वो ताजगी भी नहीं होती,
धुआं है कालिख सी भरे हुआ इस फिजा में,
घुटन सी फैली इक चादर सी बन सो रही है,
इस शहर में सांस लेने में तकलीफ हो रही है,
परिंदों के वो झुण्ड जो उड़ते थे आसमान में,
वो ना जाने जाकर, कहाँ बस गये कब से,
सुबह लाती है मेरी चादर पर ऐसी रोशनाई,
मलमल के उस चादर को मेरी बीवी धो रही है,
इस शहर में सांस लेने में तकलीफ हो रही है,
मुरझाये चेहरे से अब नजर आते हर तरफ,
सूखे होंठे पर अब मुस्कराहट भी नहीं फैली,
गहरे गड्डों से झांकती वो सुर्ख सी घूरती नजरे,
अब तो सहमे सहमे आंसुओं की बाट जो रही है,
इस शहर में सांस लेने में तकलीफ हो रही है ...
===मन वकील
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