खंड-२ मन खंडित है,असत्य जो महामंडित है,
अब विधा भी रोती,माँ सरस्वती को पुकारती,
कण कण में जहाँ गुण और संगीत थे बसते,
वो धरा क्यों है श्याम, कहाँ है अब माँ भारती,
राहों पर धूल है,पग पग पर चुभते जो शूल है ,
तिरस्कृत हो कला भी,अब मृत्यु को निहारती,
यदि मन मेरा भ्रष्ट है,तब अंतर्ध्यान मेरे कष्ट है,
बोध का हनन कर,धनलक्ष्मी से करूँ मैं आरती,
खंड-२ मन खंडित है,असत्य जो महामंडित है,
अब विधा भी रोती,माँ सरस्वती को पुकारती,
अब विधा भी रोती,माँ सरस्वती को पुकारती,
कण कण में जहाँ गुण और संगीत थे बसते,
वो धरा क्यों है श्याम, कहाँ है अब माँ भारती,
राहों पर धूल है,पग पग पर चुभते जो शूल है ,
तिरस्कृत हो कला भी,अब मृत्यु को निहारती,
यदि मन मेरा भ्रष्ट है,तब अंतर्ध्यान मेरे कष्ट है,
बोध का हनन कर,धनलक्ष्मी से करूँ मैं आरती,
खंड-२ मन खंडित है,असत्य जो महामंडित है,
अब विधा भी रोती,माँ सरस्वती को पुकारती,
जा कर कही खो जाऊं मै नीद आए और सो जाऊं मै
ReplyDeleteदुनिया मुझे ढूढे मगर मेरा निशा कोई न हो
उल्फत का बदला मिल गया
ReplyDeleteवो गम लुटा वो दिल गया
चलना है सब से दूर अब कारवा कोई न हो