Tuesday, 16 October 2012


अपनी प्रिये भार्या को समर्पित एक रचना:-

सुबह तैयार हो जाती है वो अक्सर,कर्मठ सी,
एक योद्धा की भान्ति,कर्मभूमि को गमन हेतु,
अस्त्र कहाँ है हाथों में,वो तो रखती वो बुद्धि में,
तर्कों के तीर तेज़ कर सहेजे रहती है,बन केतु,
कानून के उलटे दांवपेंच नहीं चलती वो,तीव्रा,
बस शब्दों के मायाजाल को काट करना जानती,
युद्ध व्योम में वो किसी क्षत्रिय अभिमन्यु बन,
केवल धर्म से, सच्चाई से,वो दावें लड़ना जानती,
शायद तभी,छल कपट से भरे रहते उससे परे,
ना जाने कब उसके क्रोध की ताडिता न गिर पड़े,
प्रतिशोध से नहीं बुना झूठी प्रतिष्ठा का ताना बाना,
परिणाम को चाहा उसने,पर सत्य को भी पहचाना,
परिश्रम के समस्त मापदंडों को अपने भीतर समेटे,
बस निरंतर बढती रही है वो सादगी से जीवन लपेटे,
क्रोध भी करती अक्सर वो,करती उत्तेजना से प्रहार,
यदि कोई छल करता या समक्ष होता जो भ्रष्टाचार,
कभी खिन्न हो जाती,वो देख न्याय में धन का चलन,
कैसे जियेगा निर्धन यहाँ, सोच सोच टूट जाता मन,
मंद सा होता उत्साह, क्षीण होता हुआ उसका अंतर्मन,
मैं भी हो उठता व्याकुल, अनुभव कर वो पीड़ा तपन,
रात्रि के पहर बीतते,नयी किरणें लाती नव ऊर्जा व् बल,
वो फिर उठती व्यवस्थित हो, बन एक शक्ति नारी सबल ////////////

==मन वकील


 

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