Tuesday, 9 October 2012

बहुत दिनों के बाद, आज मिले इक मित्र,
बोले झट से मुझे, कैसे हो मन वकील भाई,
अरे कई दिनों से मैं, रहा हूँ देख इस मंच पर,
आप ने अपनी कोई,नयी रचना नहीं लगाई,
दिन भर कोर्ट में पिसते,जब शाम जब आते,
नई पुरानी छोरियों के तुम, अव्यव हो दिखाते,
अजब गज़ब छाया चित्रों के नाम पर अक्सर,
नित नग्न अर्धनग्न छोरियों से संख्या बढ़ाई,
क्या सूख गये मन के भाव,जो हो गये तुम ऐसे,
केवल खोये नार तन में,जो शब्द न देत सुझाई
अरे कई दिनों से मैं, रहा हूँ देख इस मंच पर,
आप ने अपनी कोई,नयी रचना नहीं लगाई,
मैं हक्का था कुछ भौंचक्का भी था, सुनकर,
फिर बोला अरे तनिक रुक तो जाओ मेरे भाई,
सिर पर तनाव के बोझ पड़ा जब भारी भारी,
पैसे से ज्यादा अब खर्चे, जिन्दगी बनी उधारी,
ऐसे में बंधू,केवल भावों में राशन के भाव दिखते,
जब बच्चे मांगे स्कूल की फीस,रचना कैसे लिखते,
अब तो खाने को मांगती हमसे,अक्सर वो तन्हाई,
कैसे सोचे कुछ लिखे,जो रुसवा होय तुम्हारी भौजाई,
मन वकील भी है आम आदमी,नहीं कोई गौसाई,
पैसे की चाहत में,अब शैने शैने मरी रही लेखनी और लिखाई ................
==मन वकील
 

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