कभी नीले नभ सी विशाल है वो,
अपने आँचल में संसार समेटे हुए,
संतान को सीने से चिपकाए बैठी,
अंतहीन अनंता आदिशक्ति अवतारी,
वो है कुदरत स्वयं में, वो इक नारी,
कभी प्रेम बरसती जल-भरे बदरा सी,
सर्व रस निज में संजोती वो है धरा सी,
मनसा या तन्मय कभी, काम की फुहार,
रिझाती पुरुष प्रेयसी बन,कर वो श्रृंगार,
रति सी वो,आनंद दायिनी वो है दुःखहारी,
वो है कुदरत स्वयं में, वो इक नारी,
कभी चंचला सी वो, मृग सी करती विचरण,
कभी गौर गंभीरा बन,अवसादों में हो हनन,
भावों में घिरी घिरी, कभी हो जाती भाव मुक्त,
बुद्धि विचार शीलता भरी, शंतरंज के दाँव युक्त,
राजनीती से हो परे, करे कभी राजनीति वो भारी,
वो है कुदरत स्वयं में, वो इक नारी,
अतुल्य बलशालिनी कभी, कभी हो जाए निस्तेज,
क्षणिक हो शक्ति विहीन, उत्पन्न करे पुनः वो तेज़,
सहती समस्त दुःख अनाचार,तो ह्रदय में भरे शोक,
मुस्कराए जो वो खुल कर, मदमस्त हो जाए लोक,
पूजित होय मूर्त बन, प्रतक्ष्य हो सहे पीड़ा वो सारी,
वो है कुदरत स्वयं में, वो इक नारी,
इस धरा पर नवजीवन का सार वो, सर्व आधार वो,
मानवता की खोज वो,विकास वो,है शक्ति की धार वो,
देवतुल्य जन्मिता,धरा पर देवागमन का आधार वो,
सीता भी वो, लक्ष्मी और उमा सरस्वती का अवतार वो,
देव दृष्टि भी वो, श्रृष्टि भी स्वयं,पुनः मुक्ति सी समसारी,
वो है कुदरत स्वयं में, वो इक नारी,
====विश्व नारी दिवस पर बधाई सहित ...मन वकील
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