Tuesday, 20 August 2013


संदिली बदन से तेरे वो रिसती है रस के बूंदे,
मैं मदमस्त हो जाता किसी भौरांये गज सा,
यौवन करता तेरा आनंदित मुझे हे वैभवी,
तू मेरी प्रेयसी तू मेरी मधुरिमा मैं हूँ रज़ सा

काम  रस भरे तेरे दोहु नैना हिरनी से कजरारे,
मैं मूक कैसे होता भला जो तेरे होंठ करे इशारे 
तू बसी मेरे जीवन में जो नभ में बसे वो तारे,
तू है धरा सी प्यासी, मैं देता रस की वो फुहारें
तू कहती है मुझे उष्मित मैं रहा करूँ सहज सा 
तू मेरी प्रेयसी तू मेरी मधुरिमा मैं हूँ रज़ सा

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