मेहरबानियाँ जो तेरी, तू रुक कर बात कर लेता मुझसे,
वरना अकेले ही खड़े हम,जिसको रुस्वाइयाँ भी ना छूती,
चंद साल बकाया हो शायद,मेरी रुख्सती को इस दुनिया से,
झेलता यूँ हर सितम चुपचाप,कोई शह मुझसे नहीं अछूती,
मेरी ख़ामोशी को ना समझ, तू मेरी कोई रूहानी कमज़ोरी,
मैं सख्त हूँ बेसख्ता भी शायद, चाहे हो किस्मत मेरी रूठी,
खुद को खुद से समझता मैं, हूँ किसी चाहत से चाहे महरूम,
कुछ तो हूँ अलग जमाने से, शायद मेरी दीवानगी ही अनूठी,
तभी अक्सर तू खिंचा चला आता,बेवक्त यूँ मेरे पास बेबात,
रोशनी ना हो चाहे कोई,अँधेरों की कालिख मुझसे ना छूटी,
मेहरबानियाँ जो तेरी, तू रुक कर बात कर लेता मुझसे,
वरना अकेले ही खड़े हम,जिसको रुस्वाइयाँ भी ना छूती,
==मन वकील
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