वो चंद सवाल रह रह कर उठते मेरे मन में ,
क्या खोजता फिरता हूँ मैं, यहाँ वहां अक्सर,
किससे करता मैं, क्यूँकर करता मैं उम्मीद,
जब तन्हाई ही आन बसती मेरे भीतर अक्सर,
तमाशबीन है संग संगदिल लोग मिलते मुझे,
मैं खिलौना हाथों में उनके टूट जाता अक्सर,
जब भी चाहो आकर खेलो मेरे अरमानों से,
आखिर ख्वाब देखते नादाँ तुम्हारे यूँ अक्सर,
मत पूछ क्यों नहीं रोता मैं तेरे सामने ऐसे,
आँखों की झील सूख जाती यूँ मेरी अक्सर,
तू मत जा मेरे रुसवा चेहरे की शिकन पर,
कमबख्त शक्ल बना लेता ये रोंदी अक्सर ...
==मन वकील
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