Wednesday, 11 July 2012

पहन गेरुए वस्त्र, चला जोगी गंगाजी की ओर,
हाथ में थामे कावंड, चाह नहीं अब कुछ और,
मन सुमरे शिव नाम,होए रहा "बोल बम" शोर,
थिरके पग राह पर,जो नाचे मयूर सह घनघोर,
अरे, शिव की ऐसी मन में लौ है उसने जगाई,
भूला सुध बुध, पड़े नीलकंठ की राह दिखाई,
जोर जोर से वो भागे,अपने घर को पीछे छोड़     
पहन गेरुए वस्त्र, चला जोगी गंगाजी की ओर,
सावन लाये संग अपने वो कैसी पावन बेला,
शिव बसे मन, चले जोगी पथ पर ना अकेला,
कावंडमय हुआ नगर,चले शिव भक्तों का जोर,
पहन गेरुए वस्त्र, चला जोगी गंगाजी की ओर,
जन देख रहे अचरज में, कैसी शिव की भक्ति,
पग में चाहे पड़े छाले, पर मन में घटे ना शक्ति,
अरे, कैसी दुविधा,चले ना कोई पीड़ा का जोर,
पहन गेरुए वस्त्र, चला जोगी गंगाजी की ओर,
मन में धरे जोगी अपने, केवल एको बिचार,
शिव मेरे त्रिलोकपति, आन करेंगे मेरा उद्धार,
गंगाजल डाल शिवलिंग पर,थमा दूँ मन की डोर,
पहन गेरुए वस्त्र, चला जोगी गंगाजी की ओर,
मन सुमरे शिव नाम,होए रहा "बोल बम" शोर,
थिरके पग राह पर,जो नाचे मयूर सह घनघोर,
==मन वकील
इन्दर देव, अब सोये भाग जगाओ,
आओ उस बुढ़िया के घर आ जाओ,
झमझम बूंदें हर आँगन में बरसाओ,
स्याम बने बदरा ऐसा कुछ कर जाओ,
नैनों में अब काहे बरखा आने वाली है ,
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
हरे हरे सब मैदान भी हो गए है बंज़र,
पाषण भये सरोवर जल-विहीन निर्झर,
नदिया रोये अब, कैसे जाऊं मैं सागर,
तपती धूप ले जाए सब जल नभ पर,
पुष्पों की अब वेला कहाँ आने वाली है,
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
पीत भयी तपते नभ की भी पहचान,
हरे खेत जो थे अब दीखते है शमशान,
जंगल जले नित,अग्नि करे घमासान,
पवन बनी शूल जैसे,रंग बदले पाषाण,
सावन भुला राह,क्यों ऋतु हुई विकराली है?
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
चिपकी आंतें मुख सब हुए तेजहीन,
तन पर चलता स्वेद,बन चींटी महीन,
वसन लगे अवरोध, नग्न होय शालीन
अकड़ी काया,जीवन लगे क्यों अंतहीन,
क्यों ग्रीष्म मास की अवधि बढने वाली है
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
==मन वकील


 

Friday, 6 July 2012

घिरघिर आये बदरा अब मोरे अंगना, रिमझिम रिमझिम बरसे फुहार,
राग दोष सबहु मिटे ब्याकुल मन के, जबहु पड़े तन पर जल की बौछार,
कडक कड़क बिजुरिया गरजे,घन झपट झपट भागे जैसे कोई अश्व सवार,
खिले पुष्प पादप भरे बहु रंग, पात पात हिलाए पीपल ज्यो गाये मल्हार,
झरत झरत बूंदें धरा पर अमृत सी, बाल बाल झूमे इत उत मुख रहे पुकार,
जन जन भये हर्षित हो तापमुक्त,निरत करे अपनौ आंगन देयो सुधि बिसार,
सूरज अब कही जाए छिपे श्याम पट महू,जल बूंदें करत भंग तासु अहंकार,
जीवन भरे रंग चहुदिश,खग चहके हर्ष ध्वनि सह,सावन करे अबहु मनुहार 

Thursday, 5 July 2012

" रहिमन धागा प्रेम का "

सुबह सवेरे मिसेस शर्मा मचाई खूब तूफ़ान,

 शर्मा जी के पीछे पड़ करती रही घमासान,
पूरा मोहल्ला बेवजह लिया अपने सिर पर उठाय,
जो भी वस्तु हाथ धरे,वो शर्मा जी पर दीये जमाय,
मन वकील खड़ा देखे तमाशा,संग ये बुदबुधाय
मन वकील कहे "अरे रहिमन धागा प्रेम का तोड़ो मत चटकाय",
घर से निकले जब काम पर, मन में भर सब धीर,
सड़क पर देखी बिन कारण, लोगो की वो ऐसी भीड़,
तनिक पहुंचे जो नजदीक, हुए देखन को उकलाय,
इक कार बाबू , दूजे बाबू को रहा लात घूंसे जमाय,
लोग खड़े उकसाते रहे, ना कोई रहा वाको समझाय
मन वकील सोचे "अरे रहिमन धागा प्रेम का तोड़ो मत चटकाय",
जब पहुंचे कोर्ट में, दीखे अज़ब गज़ब सा वो केस,
भैया बहन पे दावा करे, बहन खींच रही भाई के केश
बापू के जायदाद के बंटवारे को, दोहु होत रहे अब भौंराय,
पब्लिक में एक दूजे को कोसे,दिए खून के रिश्ते भुलाय,
वकील अब सेंक रहे रोटी,बापू के दौलत रहे दोहु मिटाय,
मन वकील कैसे कहे, "अरे रहिमन धागा प्रेम का तोड़ो मत चटकाय",

" रहिमन धागा प्रेम का "

सुबह सवेरे मिसेस शर्मा मचाई खूब तूफ़ान,

 शर्मा जी के पीछे पड़ करती रही घमासान,
पूरा मोहल्ला बेवजह लिया अपने सिर पर उठाय,
जो भी वस्तु हाथ धरे,वो शर्मा जी पर दीये जमाय,
मन वकील खड़ा देखे तमाशा,संग ये बुदबुधाय
मन वकील कहे "अरे रहिमन धागा प्रेम का तोड़ो मत चटकाय",
घर से निकले जाब काम पर, मन में भर धीर,
सड़क पर देखी बिन कारण, लोगो की वो भीड़,
तनिक पहुंचे जो नजदीक, और देखन को उकलाय,
इक कार बाबू , दूजे बाबू को रहा लात घूंसे जमाय,
लोग खड़े उकसाते रहे, ना कोई रहा वाको समझाय
मन वकील सोचे "अरे रहिमन धागा प्रेम का तोड़ो मत चटकाय",
जब पहुंचे कोर्ट में, दीखे अज़ब गज़ब सा वो केस,
भैया बहन पे दावा करे, बहन खींच रही भाई के केश
बापू के जायदाद के बंटवारे को, दोहु होत रहे अब भौंराय,
पब्लिक में एक दूजे को कोसे,दिए खून के रिश्ते भुलाय,
वकील अब सेंक रहे रोटी,बापू के दौलत रहे दोहु मिटाय,
मन वकील कैसे कहे, "अरे रहिमन धागा प्रेम का तोड़ो मत चटकाय",

Wednesday, 4 July 2012

विद्रोह की पीड़ा

विद्रोह की पीड़ा, कभी देखी है आपने,

यदि नहीं, तो गौर करना अवश्य तुम,
किसी आतंकवादी की माँ के चेहरे पर,
स्याह चिंता के घेरों कैसे आन बसी हुई,
उस माँ की आँखों के लाल सुर्ख कोनों में,
जहाँ अब अश्रु सूख गए है बार-२ बहकर,
विद्रोह की पीड़ा, कभी देखी है आपने,
यदि नहीं, तो गौर करना अवश्य तुम,
किसी सिपाही की विधवा के माथे पर,
जहाँ अब बिंदिया की जगह एक चिन्ह,
जो उसके घिसने पर भी नहीं मिटता अब,
और जिसके बसंत अब पतझड़ बन गये,
विद्रोह की पीड़ा, कभी देखी है आपने,
यदि नहीं, तो गौर करना अवश्य तुम, 
उस पिता के खाली पड़े बूढ़े चेहरे पर,
जहाँ अब नाउम्मीदी ने घर कर लिया,
जिसकी लकड़ी की लाठी बार बार पूछती,
बता मुझे, मैं भली थी या तेरा अपना बीज,
विद्रोह की पीड़ा, कभी देखी है आपने,
यदि नहीं, तो गौर करना अवश्य तुम,
कभी झाँक लेना शहर के अनाथाश्रम में,
जहाँ कई मासूमों की किस्मत में पुत गई,
माँ बाप की अचानक हुई मौत की कालिख,
शहर में फटे बम की आग की तीखी तपिश से,  
===मन वकील

Monday, 2 July 2012

अरे चन्द सिक्कों में बिकते ज़मीर को देखा,
बिन कपड़ों के बिकती हुस्न की तस्वीर को देखा,
मुल्क में निजाम है यारों अब करप्शन के जोर पर,
तभी संसद में बैठे शातिरों की तक़रीर को देखा,
सियासतदानो के हवाई सफ़र तो होते हर रोज़,
अब तो उनके चमचों की बनती ताबीर को देखा,
खेल के मैदानों में अब खेल कोई और खेलता,
किसी कोने में रोती खिलाडी की तकदीर को देखा,
कभी थानों में बिकती है कानून की अस्मत हर रात
अब तो कचहरी में लुटते इन्साफ बेनजीर को देखा
मत गिरा नज़रों से अपनी मेरी ईमानदारी को ऐसे,
बेशक तुने बईमानी के बढती हुई शमशीर को देखा,
===मन वकील