Thursday, 5 July 2012


" रहिमन धागा प्रेम का "

सुबह सवेरे मिसेस शर्मा मचाई खूब तूफ़ान,

 शर्मा जी के पीछे पड़ करती रही घमासान,
पूरा मोहल्ला बेवजह लिया अपने सिर पर उठाय,
जो भी वस्तु हाथ धरे,वो शर्मा जी पर दीये जमाय,
मन वकील खड़ा देखे तमाशा,संग ये बुदबुधाय
मन वकील कहे "अरे रहिमन धागा प्रेम का तोड़ो मत चटकाय",
घर से निकले जाब काम पर, मन में भर धीर,
सड़क पर देखी बिन कारण, लोगो की वो भीड़,
तनिक पहुंचे जो नजदीक, और देखन को उकलाय,
इक कार बाबू , दूजे बाबू को रहा लात घूंसे जमाय,
लोग खड़े उकसाते रहे, ना कोई रहा वाको समझाय
मन वकील सोचे "अरे रहिमन धागा प्रेम का तोड़ो मत चटकाय",
जब पहुंचे कोर्ट में, दीखे अज़ब गज़ब सा वो केस,
भैया बहन पे दावा करे, बहन खींच रही भाई के केश
बापू के जायदाद के बंटवारे को, दोहु होत रहे अब भौंराय,
पब्लिक में एक दूजे को कोसे,दिए खून के रिश्ते भुलाय,
वकील अब सेंक रहे रोटी,बापू के दौलत रहे दोहु मिटाय,
मन वकील कैसे कहे, "अरे रहिमन धागा प्रेम का तोड़ो मत चटकाय",

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