इन्दर देव, अब सोये भाग जगाओ,
आओ उस बुढ़िया के घर आ जाओ,
झमझम बूंदें हर आँगन में बरसाओ,
स्याम बने बदरा ऐसा कुछ कर जाओ,
नैनों में अब काहे बरखा आने वाली है ,
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
हरे हरे सब मैदान भी हो गए है बंज़र,
पाषण भये सरोवर जल-विहीन निर्झर,
नदिया रोये अब, कैसे जाऊं मैं सागर,
तपती धूप ले जाए सब जल नभ पर,
पुष्पों की अब वेला कहाँ आने वाली है,
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
पीत भयी तपते नभ की भी पहचान,
हरे खेत जो थे अब दीखते है शमशान,
जंगल जले नित,अग्नि करे घमासान,
पवन बनी शूल जैसे,रंग बदले पाषाण,
सावन भुला राह,क्यों ऋतु हुई विकराली है?
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
चिपकी आंतें मुख सब हुए तेजहीन,
तन पर चलता स्वेद,बन चींटी महीन,
वसन लगे अवरोध, नग्न होय शालीन
अकड़ी काया,जीवन लगे क्यों अंतहीन,
क्यों ग्रीष्म मास की अवधि बढने वाली है
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
==मन वकील
आओ उस बुढ़िया के घर आ जाओ,
झमझम बूंदें हर आँगन में बरसाओ,
स्याम बने बदरा ऐसा कुछ कर जाओ,
नैनों में अब काहे बरखा आने वाली है ,
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
हरे हरे सब मैदान भी हो गए है बंज़र,
पाषण भये सरोवर जल-विहीन निर्झर,
नदिया रोये अब, कैसे जाऊं मैं सागर,
तपती धूप ले जाए सब जल नभ पर,
पुष्पों की अब वेला कहाँ आने वाली है,
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
पीत भयी तपते नभ की भी पहचान,
हरे खेत जो थे अब दीखते है शमशान,
जंगल जले नित,अग्नि करे घमासान,
पवन बनी शूल जैसे,रंग बदले पाषाण,
सावन भुला राह,क्यों ऋतु हुई विकराली है?
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
चिपकी आंतें मुख सब हुए तेजहीन,
तन पर चलता स्वेद,बन चींटी महीन,
वसन लगे अवरोध, नग्न होय शालीन
अकड़ी काया,जीवन लगे क्यों अंतहीन,
क्यों ग्रीष्म मास की अवधि बढने वाली है
सूखी घाघर बुढ़िया की क्यों खाली है?
==मन वकील
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