Monday, 11 June 2012

हमारा सचिन तेंदुलकर

वो है क्रिकेट का भी असली जेंटल मेन,
सौम्य सरल पारंगत,जो कहते सब फैन,
नित नए रिकार्ड रचे लगाये नित शतक,
हर गेंद को सहज ही खेले,पारी होने तक,
यदि आउट होय, तो भी रहता वो शांत,
प्रशंसा करते सब, कपिल हो या श्रीकांत,
ब्रेडमैन से करते,देसी बिदेसी उसका मेल,
अलग शान से, अलग ढंग से खेले वो खेल,
तभी राजनीतिज्ञों ने बुला उसका पूछा हाल,
राज्यसभा में नामित कर,फेंका मायाजाल,
करने सुशोभित उसकी विधा,भेजा शाहीपत
आओ प्यारे संग बैठो हमारे,लेकर एक शपथ   
झटपट ही कर डाला,संसद में उसका टीका,
अखबारों में जोरदार छपा,पर लगता था फीका,
फिर किया सरकार ने, उस प्यारे पर अहसान,
युवराज़ के पास बंगला अलोटकर,बढाई शान,
पर वो प्यारा था सचमुच सच्चा सहज सरल,
झट मना किया,रहने को वो बंगला अविरल,
राज्यसभा में आया अब,इक असल जेंटलमेन,
जो सत्ता के भूखों से अलग चल, करें उन्हें बैचैन ...........
=========मन वकील

Sunday, 10 June 2012

सक्षम असक्षम,

मैं हूँ जो सक्षम,ओढ़े रहता दर्प की मैली इक चादर,
मुझ में बसे सर्व दोष,भरते मुझमे पल पल निरादर,
वो दृष्टिहीन राहुल, जन्मजात बंधित दृष्टि विहीन,
वो ज्ञात रखता मार्ग में,खोज लेता सब तंत महीन,
मैं जो कहता निज नेत्रवान, गिरता रहता हर पग,  
दिशाविहीन बन भटकता,जान सकूँ ना मैं इह जग,
वो बधिर सोनू, जो बंधित हो श्रवन विहीन चराचर,
समझ गुणांक जग अति रख,मूलबुद्धि बनाए अनुचर,
मैं श्रोता सा कुवसन धर,केवल संजोता बानी अनुचित,
केवल तंतु-जाल में फंस,सठ सुन ना पाऊं हित उचित,  
वो मूक वीणा रहे हंसती,इंगित कर जग में बोल भरती,
कुबाणि का भेद ना जाने,भला भला ही चिन्हित करती,
मैं बन अमूक केवल करता कुभाष,बिन सोचे परिणाम,
तीखी व्यंगित बानी से,प्रारंभ करता इहा नित नए संग्राम
वो शैलेश पंगु बन,खोज लेता हर डगर हर राह हो सक्षम,
मैं पांवों से ठोकर खाता, गर्त में नित गिर बना असक्षम,
प्रभु दिए जब शारीरिक दोष, सहित बुद्धि विवेक संतोष,
हम सक्षम को दिए सुतन,सह क्रोध लोभ सहु सब दोष /////////////////////////

"नि" को महिमा

आशा और निराशा में एक ही है घट अंतर, "नि" को अंतर,
जुड़ जाए "नि" अति बनकर, तो बन जाता नियति निरंतर,
जो मिले मोह में अति बनकर,तो मनु को कर देयो निर्मोही,
अगर मिले मूल में कभी "नि",जो निर्मूल भये सकल विद्रोही,
"नि" को समावेश होत लज्जा में अति,जासु नार होवे निर्लज्ज,
 बसे "नि" प्रेमआतुर महु अति बन, करत प्रेयसी निष्ठुर रज-रज,
"नि" छुपे मम "नियत" महु  ऐसे,ज्यो सर्प पादपबिटप घनघोरा,
"नि" मिले स्वार्थ बिन कबहु, तो अरि बनहु "निज" ही मनमोरा,
"नि" को महिमा मन सकल पहचानी,"नि" करे परवर्तित सुभाष
"नि" करे निमित निश्छल जो छल अज्ञानी,जो मिटे सठ कुहास
====मन वकील

Wednesday, 6 June 2012

चंद सिक्को में बिकता हे यहाँ इंसान का ज़मीर,
कौन कहता है, मेरे मुल्क में महंगाई बहुत है,
फाइलों से छापते है बाबू , यहाँ नोट पर नोट,
कम्बल,दारु की बोतलों में बिकते यहाँ वोट,
थानों में बहे जाती है अनाचार की वो गंगा,
पैसे के लिए पीटे गरीब, दरोगा करके उसे नंगा,
अस्मत लूटी जाती है हस्पतालों में भी अक्सर,
रिश्वतखोर बाबू को रिश्वत लेकर छोड़े सीबीआई अफसर,
संसद के गलियारों में महफ़िलें,मिटे मुल्क की तामीर,
अब रोये आम आदमी, मन में मायूसी तन्हाई बहुत है
 
चंद सिक्को में बिकता हे यहाँ इंसान का ज़मीर,
कौन कहता है, मेरे मुल्क में महंगाई बहुत है,
हरा या पीला या सिंदूरी सा,
संग गुलाबी सी,रंगत लेकर,
सुगंध बिखेरता अनोखी सी,
नरम कभी या सख्त सेकर,
कभी रेशे सा भर देता मुख,
या मधुमाखन बन देता सुख,
कोई चूसे लेकर इसे चटकारे,
कोई फांके खाए संग भरे हुंकारे,
जन मानस की बन मुस्कान,
ग्रीष्म ऋतु की वो है पहचान,
ग़ालिब के ह्रदय बसे बन शेर,
खूब खाए इसे वो अनुपम खेर,
जूस की दूकान पर बढाए भीड़,
बच्चे बूढ़े या जवान,होय अधीर,
कभी दशेहरी या मलीहाबादी,
कभी चौसा बन,लुभाए आबादी,
कही अलफांसो, या केसरिया,
हर किसी का बने लोभ-पीया,
किस्म किस्म के धरे वो रूप,
जन-जन खाए मन अनुरूप,
भौर आये जब इसकी आहट,
मुग्धाय खग,भौराय जमावट,
जब जब आये बिकने को मंडी,
ढेर ढेर दिखे यहाँ वहां चौखंडी,
भरे खरीद मनचाहा,कोई थैले,
कोई भरे पेटी,संग कागज़ मैले,
कोई कच्चा लेवे, और कटवाए,
मुरब्बा बनाए,कोई अचार बनाए,
कोई कच्चा समूचा इसे पकावे,
जो आमरस-पन्ना स्वाद जमावे,
रोज़ बढ़ते है अब इसके दाम,
अब निर्धन कैसे खाए "आम"


हर वक्त पुरानी बातों का मैं रोना रहता हूँ,
जो बात नहीं थी कहने की मैं क्यों कहता हूँ,
अनबुझे सवालों के उत्तर युहीं ढूंढ़ता रहता मैं,
मिले जवाबों के जोड़ भुला,उलझा ही रहता मैं,
मकड़ी की तरह,नीचे गिर ऊपर उठने की चाह,
अपनी राहों में जालों से बंधा,वो पीड़ा सहता हूँ,
हर वक्त पुरानी बातों का मैं रोना रहता हूँ,
जो बात नहीं थी कहने की मैं क्यों कहता हूँ,
पथिक बनूँ या राह का पत्थर, उलझन हूँ मैं,
धूल नहीं जो नभ उडू,मन जनित बंधन हूँ मैं,
कोई कहे मुझे कुछ, मैं क्यों करता प्रतिकार,
व्यथित हो स्वयम प्रतिशोध में जलता रहता हूँ 
हर वक्त पुरानी बातों का मैं रोना रहता हूँ,
जो बात नहीं थी कहने की मैं क्यों कहता हूँ,
नयी इच्छाओं का दमन, मन क्यों अब करें,
जो पंख दिये मुझे लालसा ने, उड़ान क्यों ना भरे,
चेतना अब करूँ जागृत, अंतर्मन में बसा वासना,
आनंदित मन हो सुध भुला, चेष्टा करता रहता हूँ
हर वक्त पुरानी बातों का मैं रोना रहता हूँ,
जो बात नहीं थी कहने की मैं क्यों कहता हूँ, 

Saturday, 2 June 2012

मैं खड़ा हूँ ऐसे वक्त के चौराहें पर,
जहाँ कल की यादें बार बार आकर,
मेरे आज को यूँ है अक्सर डराती,
क्यों करूँ मैं आते कल की चिंता,
वो जो ना जाने कैसा हो मेरे खुदा?
फिर क्यूँकर उसकी फ़िक्र सताती,
मेरे क़दमों ने कल जहाँ ख़ाक छानी,
वो रास्ते ना अब, अजनबी है मुझसे,
मैं खड़ा रहा वही,वो डगर कहीं है जाती,
मुझे क्या खबर होगी, उन मंजिलों की,
जो कभी ना मैंने है देखी,आवारा जो मैं,
मुझे धूल फांकनी थी,तो मंजिले क्यों भाती,
मैं खड़ा हूँ ऐसे वक्त के चौराहें पर,
जहाँ कल की यादें बार बार आकर,
मेरे आज को यूँ है अक्सर डराती,