Wednesday, 6 June 2012

हरा या पीला या सिंदूरी सा,
संग गुलाबी सी,रंगत लेकर,
सुगंध बिखेरता अनोखी सी,
नरम कभी या सख्त सेकर,
कभी रेशे सा भर देता मुख,
या मधुमाखन बन देता सुख,
कोई चूसे लेकर इसे चटकारे,
कोई फांके खाए संग भरे हुंकारे,
जन मानस की बन मुस्कान,
ग्रीष्म ऋतु की वो है पहचान,
ग़ालिब के ह्रदय बसे बन शेर,
खूब खाए इसे वो अनुपम खेर,
जूस की दूकान पर बढाए भीड़,
बच्चे बूढ़े या जवान,होय अधीर,
कभी दशेहरी या मलीहाबादी,
कभी चौसा बन,लुभाए आबादी,
कही अलफांसो, या केसरिया,
हर किसी का बने लोभ-पीया,
किस्म किस्म के धरे वो रूप,
जन-जन खाए मन अनुरूप,
भौर आये जब इसकी आहट,
मुग्धाय खग,भौराय जमावट,
जब जब आये बिकने को मंडी,
ढेर ढेर दिखे यहाँ वहां चौखंडी,
भरे खरीद मनचाहा,कोई थैले,
कोई भरे पेटी,संग कागज़ मैले,
कोई कच्चा लेवे, और कटवाए,
मुरब्बा बनाए,कोई अचार बनाए,
कोई कच्चा समूचा इसे पकावे,
जो आमरस-पन्ना स्वाद जमावे,
रोज़ बढ़ते है अब इसके दाम,
अब निर्धन कैसे खाए "आम"


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