Sunday, 10 June 2012

"नि" को महिमा

आशा और निराशा में एक ही है घट अंतर, "नि" को अंतर,
जुड़ जाए "नि" अति बनकर, तो बन जाता नियति निरंतर,
जो मिले मोह में अति बनकर,तो मनु को कर देयो निर्मोही,
अगर मिले मूल में कभी "नि",जो निर्मूल भये सकल विद्रोही,
"नि" को समावेश होत लज्जा में अति,जासु नार होवे निर्लज्ज,
 बसे "नि" प्रेमआतुर महु अति बन, करत प्रेयसी निष्ठुर रज-रज,
"नि" छुपे मम "नियत" महु  ऐसे,ज्यो सर्प पादपबिटप घनघोरा,
"नि" मिले स्वार्थ बिन कबहु, तो अरि बनहु "निज" ही मनमोरा,
"नि" को महिमा मन सकल पहचानी,"नि" करे परवर्तित सुभाष
"नि" करे निमित निश्छल जो छल अज्ञानी,जो मिटे सठ कुहास
====मन वकील

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