Wednesday, 6 June 2012

हर वक्त पुरानी बातों का मैं रोना रहता हूँ,
जो बात नहीं थी कहने की मैं क्यों कहता हूँ,
अनबुझे सवालों के उत्तर युहीं ढूंढ़ता रहता मैं,
मिले जवाबों के जोड़ भुला,उलझा ही रहता मैं,
मकड़ी की तरह,नीचे गिर ऊपर उठने की चाह,
अपनी राहों में जालों से बंधा,वो पीड़ा सहता हूँ,
हर वक्त पुरानी बातों का मैं रोना रहता हूँ,
जो बात नहीं थी कहने की मैं क्यों कहता हूँ,
पथिक बनूँ या राह का पत्थर, उलझन हूँ मैं,
धूल नहीं जो नभ उडू,मन जनित बंधन हूँ मैं,
कोई कहे मुझे कुछ, मैं क्यों करता प्रतिकार,
व्यथित हो स्वयम प्रतिशोध में जलता रहता हूँ 
हर वक्त पुरानी बातों का मैं रोना रहता हूँ,
जो बात नहीं थी कहने की मैं क्यों कहता हूँ,
नयी इच्छाओं का दमन, मन क्यों अब करें,
जो पंख दिये मुझे लालसा ने, उड़ान क्यों ना भरे,
चेतना अब करूँ जागृत, अंतर्मन में बसा वासना,
आनंदित मन हो सुध भुला, चेष्टा करता रहता हूँ
हर वक्त पुरानी बातों का मैं रोना रहता हूँ,
जो बात नहीं थी कहने की मैं क्यों कहता हूँ, 

No comments:

Post a Comment