मैं हूँ जो सक्षम,ओढ़े रहता दर्प की मैली इक चादर,
मुझ में बसे सर्व दोष,भरते मुझमे पल पल निरादर,
वो दृष्टिहीन राहुल, जन्मजात बंधित दृष्टि विहीन,
वो ज्ञात रखता मार्ग में,खोज लेता सब तंत महीन,
मैं जो कहता निज नेत्रवान, गिरता रहता हर पग,
दिशाविहीन बन भटकता,जान सकूँ ना मैं इह जग,
वो बधिर सोनू, जो बंधित हो श्रवन विहीन चराचर,
समझ गुणांक जग अति रख,मूलबुद्धि बनाए अनुचर,
मैं श्रोता सा कुवसन धर,केवल संजोता बानी अनुचित,
केवल तंतु-जाल में फंस,सठ सुन ना पाऊं हित उचित,
वो मूक वीणा रहे हंसती,इंगित कर जग में बोल भरती,
कुबाणि का भेद ना जाने,भला भला ही चिन्हित करती,
मैं बन अमूक केवल करता कुभाष,बिन सोचे परिणाम,
तीखी व्यंगित बानी से,प्रारंभ करता इहा नित नए संग्राम
वो शैलेश पंगु बन,खोज लेता हर डगर हर राह हो सक्षम,
मैं पांवों से ठोकर खाता, गर्त में नित गिर बना असक्षम,
प्रभु दिए जब शारीरिक दोष, सहित बुद्धि विवेक संतोष,
हम सक्षम को दिए सुतन,सह क्रोध लोभ सहु सब दोष /////////////////////////
मुझ में बसे सर्व दोष,भरते मुझमे पल पल निरादर,
वो दृष्टिहीन राहुल, जन्मजात बंधित दृष्टि विहीन,
वो ज्ञात रखता मार्ग में,खोज लेता सब तंत महीन,
मैं जो कहता निज नेत्रवान, गिरता रहता हर पग,
दिशाविहीन बन भटकता,जान सकूँ ना मैं इह जग,
वो बधिर सोनू, जो बंधित हो श्रवन विहीन चराचर,
समझ गुणांक जग अति रख,मूलबुद्धि बनाए अनुचर,
मैं श्रोता सा कुवसन धर,केवल संजोता बानी अनुचित,
केवल तंतु-जाल में फंस,सठ सुन ना पाऊं हित उचित,
वो मूक वीणा रहे हंसती,इंगित कर जग में बोल भरती,
कुबाणि का भेद ना जाने,भला भला ही चिन्हित करती,
मैं बन अमूक केवल करता कुभाष,बिन सोचे परिणाम,
तीखी व्यंगित बानी से,प्रारंभ करता इहा नित नए संग्राम
वो शैलेश पंगु बन,खोज लेता हर डगर हर राह हो सक्षम,
मैं पांवों से ठोकर खाता, गर्त में नित गिर बना असक्षम,
प्रभु दिए जब शारीरिक दोष, सहित बुद्धि विवेक संतोष,
हम सक्षम को दिए सुतन,सह क्रोध लोभ सहु सब दोष /////////////////////////
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