मैं खड़ा हूँ ऐसे वक्त के चौराहें पर,
जहाँ कल की यादें बार बार आकर,
मेरे आज को यूँ है अक्सर डराती,
क्यों करूँ मैं आते कल की चिंता,
वो जो ना जाने कैसा हो मेरे खुदा?
फिर क्यूँकर उसकी फ़िक्र सताती,
मेरे क़दमों ने कल जहाँ ख़ाक छानी,
वो रास्ते ना अब, अजनबी है मुझसे,
मैं खड़ा रहा वही,वो डगर कहीं है जाती,
मुझे क्या खबर होगी, उन मंजिलों की,
जो कभी ना मैंने है देखी,आवारा जो मैं,
मुझे धूल फांकनी थी,तो मंजिले क्यों भाती,
मैं खड़ा हूँ ऐसे वक्त के चौराहें पर,
जहाँ कल की यादें बार बार आकर,
मेरे आज को यूँ है अक्सर डराती,
जहाँ कल की यादें बार बार आकर,
मेरे आज को यूँ है अक्सर डराती,
क्यों करूँ मैं आते कल की चिंता,
वो जो ना जाने कैसा हो मेरे खुदा?
फिर क्यूँकर उसकी फ़िक्र सताती,
मेरे क़दमों ने कल जहाँ ख़ाक छानी,
वो रास्ते ना अब, अजनबी है मुझसे,
मैं खड़ा रहा वही,वो डगर कहीं है जाती,
मुझे क्या खबर होगी, उन मंजिलों की,
जो कभी ना मैंने है देखी,आवारा जो मैं,
मुझे धूल फांकनी थी,तो मंजिले क्यों भाती,
मैं खड़ा हूँ ऐसे वक्त के चौराहें पर,
जहाँ कल की यादें बार बार आकर,
मेरे आज को यूँ है अक्सर डराती,
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