Wednesday, 6 June 2012

चंद सिक्को में बिकता हे यहाँ इंसान का ज़मीर,
कौन कहता है, मेरे मुल्क में महंगाई बहुत है,
फाइलों से छापते है बाबू , यहाँ नोट पर नोट,
कम्बल,दारु की बोतलों में बिकते यहाँ वोट,
थानों में बहे जाती है अनाचार की वो गंगा,
पैसे के लिए पीटे गरीब, दरोगा करके उसे नंगा,
अस्मत लूटी जाती है हस्पतालों में भी अक्सर,
रिश्वतखोर बाबू को रिश्वत लेकर छोड़े सीबीआई अफसर,
संसद के गलियारों में महफ़िलें,मिटे मुल्क की तामीर,
अब रोये आम आदमी, मन में मायूसी तन्हाई बहुत है
 
चंद सिक्को में बिकता हे यहाँ इंसान का ज़मीर,
कौन कहता है, मेरे मुल्क में महंगाई बहुत है,

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