Wednesday, 25 July 2012

कौन है? जो कभी पेड़ ना था,
जिसकी शाखों पर आ आकर,
कभी सपनों के पंछी ना बैठे हो,
या फिर मौसम की सर्द हवा,
आकर उसे कंपकपा न गयी हो,
या फिर तपते सूरज की तपिश,
उसकी छाल को जला ना दिया हो,
झड़ जाते होंगे उसके वो हरे पत्ते,
पीले हो होकर दुखों से मिलकर,
नमी आंसुओं की भी बहती होगी,
वो अहसास किया होगा महसूस,
सावन की बूंदों सी खुशियों का,
या फिर अचानक जल उठने का,
हर कोई यहाँ एक पेड़ बन जिया,
कोई पीपल बना रहा जीवन में,
कुछ बने रहे नीम से गुणों से भरे,
कोई ताड़ सा बन जिया ऐसे,
अलग अहंकार में अकड़ कर,
कोई बेल सा लिपटा रहा होगा,
सदा दूसरों के सहारे,घूमघूम कर,
कोई अमरबेल सा भी रहा होगा,
चूसता रहता है दूसरों को हमेशा,
हर कोई पेड़ है और पेड़ जैसे ही,
अपनी जमीन खोजता रहता है,
अपनी जड़े फैलाने के लिए हमेशा,
कुछ जमे रहते कई कई सालों तक,
कुछ एक जीते है कई युगों तक,
कुछ मुझ जैसे जमीन में धंसे-धंसे,
ढूंढ़ते रहते है एक जड़ सा विश्वास,
शायद आँधियों का सामना करते,
सदैब झुक झुक कर, नत-मस्तक हो,
शायद तभी जी जाते वो हर मौसम,    
तभी तो कहता हूँ मैं यह अक्सर,
कौन है? जो कभी पेड़ ना था,
==मन-वकील

Tuesday, 17 July 2012

करत करत नक़ल, अब बालक पाए ज्ञान,
मास्टर जी ट्यूशन पढाये, दूर करें अज्ञान,
दूर करें अज्ञान, चलने लगी नयी परिपाटी,
पैसे से शिक्षा मिले,बिन पैसे वो कूटे माटी,
वो कूटे माटी,धनिक बढ़ते उन्नति की राह,  
विदेशों में भ्रमण करते,गहरी जिनकी थाह,
गहरी जिनकी थाह,अनपढ़ खोले यूनिवर्सिटी,
नीले पीले गाँधी जी से,हर डिग्री रहे बरसती,
डिग्री रहे बरसती, सरकारें अब लूटे वाहवाही,
शिक्षा को बेच बेच,निकम्मे खाए जाते मलाई,
कहे मन-वकील,बालकों,लो अब तुम ये ठान,
मनमर्जी की शिक्षा लूटों, बेच रहे सब संस्थान.....
===मन वकील    

Monday, 16 July 2012

कैद किये हुए वो सपने,
आज भी झांकते रहते,
कभी फटी हुई शर्ट से,
कभी मैली बनियान से,
कभी कभी तो गिर पड़ते,
उसकी कुचली पतलून की,
फटी हुई जेब से धडाम से,
कितनी कोशिश करता वो,
अपनी थकी हुई उँगलियों से,
उन सपनो को रोकने की,
पर ना जाने कैसे, हर बार,
वो फिसल ही जाते हमेशा,
उसकी पकड़ से निकलकर,
कभी कभार वो रोकता उन्हें,
अपनी पथराई आँखों में रख,  
फिर कोई वजह, बेवजह ही,
आकर उड़ेल देती, अचानक
आंसुओं की भरी वो गागर,
उन आँखों के कोनों के रास्ते,
वो सपने बह जाते, तेज़ी से,
छोड़ जाते उसके दिल में,
दर्द के निशान, गहरे निशान,
वो बस चुपचाप खड़ा रहता,
शायद और सपने आने की,
इंतज़ार में युहीं रहता खड़ा ....
==मन वकील 

Sunday, 15 July 2012

भाई है वो मेरा

जब वो छोटा सा था,शायद छोटा सा,
तब वो आकर मेरे कंधे पर चढ़ जाता,
जिद करने लगता कंधे पर लधे लधे,
भैया,खड़े हो जाओ,मुझे चाँद है देखना,
तब मैं उस बाल-सुलभ जिद के लिए,
उचककर खड़ा हो जाता उसे थाम कर,
और वो यूहीं मेरे कंधे पर बैठे हुए,ऐसे,
मेरे सिर को अपने हाथों से हुए कसे,
खिलखिलाकर वो चाँद देखा करता,
आज जब वो बड़ा हो गया है, मुझसे,
अब भी वो अक्सर चाँद देखने के लिए,
चढ़ जाता है यूहीं मेरे कंधो पर ऐसे,
बिना मुझसे कुछ कहे,बिन मुझसे पूछे,
कसकर जकड़ लेता वो मेरा सिर जैसे,
और अब खिलवाड़ भरी हंसी हँसता वो,
शायद मुझे रोंद, अब वो चाँद देखना,
उसकी फितरत में होने लगा है शुमार,
तभी मुझसे मेरी उंचाई छीन कर,वो,
खून के रिश्तों को निभा रहा, बस ऐसे,
और मैं बेजुबान सा कभी यूहीं बैठता,
या फिर उसके के कहने पर खड़ा होता,
भाई है वो मेरा,जिसे चाँद देखना है,
आज भी मेरे कन्धों पर चढ़ कर ऐसे....      
==मन वकील

ना मैं कोई पीरो मुर्शिद, ना मैं कोई हूँ फकीर,

ना मैं कोई पीरो मुर्शिद, ना मैं कोई हूँ फकीर,
हाड मांस का पुतला हूँ, और हाथों में चंद लकीर,
ना मैं बनूँ कायदे दरोगा, ना मुंसिफ ना वजीर,
खास नहीं मैं कोई यहाँ, ना मैं हाफ़िज़े तदबीर,
दर्द समेटे कभी सीने में,खुशियों की बनूँ तस्वीर,
कुछ वायदे रहूँ निभाता, कभी कोसता वो तकदीर,
ना मैं कोई पीरो मुर्शिद, ना मैं कोई हूँ फकीर,
हाड मांस का पुतला हूँ, और हाथों में चंद लकीर,
अंधियारे का भी डर मुझको, खौफजदा सी तामीर,
दुश्मनी का दामन ना थामूं,हाथों में न रखूं शमशीर,
कभी सहूँ तो कभी पुकारूं,कभी करता फिरूँ तक़रीर,
लाख चाहने पर टूट ना पाए,मन में बंधी हुई जंजीर,
ना मैं कोई पीरो मुर्शिद, ना मैं कोई हूँ फकीर,
हाड मांस का पुतला हूँ, और हाथों में चंद लकीर,
==मन-वकील

Saturday, 14 July 2012

वो सूनी सूनी सी आँखें,
जो अब देखती है कम,
उनके भीतर से झलकता,
दुःख का वो गहरा समंदर,
कितने तूफ़ान झेल झेल,
अब शायद हो गया शांत,
बाट जोहती रहती हर-पल,
उस मेहमान का जो शायद,
मुड़कर वापिस भी ना आये,
जो कल तक रहा था अपना,
जो अपने ही खून से सींचा,
अपने ही शरीर से था जना,
आज नए नए रिश्ते जोड़,
गया पुराने रिश्तों को तोड़,
कोई है जो बैठी है इतने पास,
शायद उन आखों में बसी आस,
झूठी है वो आस, एक छलावा,
पर कमबख्त साथ नहीं छोडती,
रोज़ सुबह सूरज उगने के साथ,
आ बैठती वहीँ उन आखों में,
साथ ले आती अपने वो अक्सर,
पुरानी यादों को समेट कर ऐसे,
जैसे ही सूरज ढलने को होता,
वो भी गुम होने लगती वैसे वैसे,
घुल जाती फिर वो स्याह रात में,
पर वो बीती यादें वहीँ अड़ी रहती  ,
धकेलती रहती आंसुओं को नीचे,
उन सूख चुकी आँखों के कोनों से,
धीरे धीरे गालों की खुदरी सतह पर,
कल जिसकी ऊँगली थामकर, वो ,
रास्ते पर बड़े फख्र से था चलता,
आज वो उँगलियाँ इतनी है बड़ी,
जो छप गयी उसके बूढ़े चेहरे पर,
नाउम्मीदी तो है उसे अब हमेशा,
अपनी औलाद से,पर मोह है बाकी,
तभी तो वो बूढी आँखें तकती है रोज़,
उस नाशुक्र औलाद की राह, बेरोक .................
==मन वकील
मैं क्या हूँ? मैं क्या करता हूँ?
मैं क्यों करता हूँ अक्सर ऐसे?
कई सवाल कुलबुलाते रहते,
मेरे जेहन में, बार बार युहीं,
किस बात की झूठी आस है,
क्या उम्मीद का है फलसफां,
इक आह पीछा छोड़ जाती जो,
दूसरी जल्द ही घर कर लेती,
मेरे आंसुओं के दरिया में आकर,
सोच, क्या सोच है बस मेरी,
बीती यादों का कफ़न लपेटे,
बस उठाती रहती हर वक्त,
उनके साथ बिताये पलों का,
वो बोझ,जो हर रोज़ बढ़ता,
दिल कितना टूटे?क्या करूँ?
आखिर हर वक्त मरना भी,
मुझे रास नहीं आता है अब,
कोई कमी थी? या नहीं,
मुझे क्यों कोसता रहता?
अकसर वो, नाकामियाब मैं,
लोग कहते, छोड़ दे आगे बढ़,
पर जो खाल बन चिपका हो,
उसे तो मरने के बाद ही, मैं,
शायद अलग कर पाऊँ खुद से,
दुःख नहीं है, बस इक कमी है,
जो मुझे याद दिलाती रहती,
शिकस्त का वो तीखा अहसास,
हर बार ही क्यूँ मैं हार गया?
जीत न सका कभी भी मैं,
शायद जंग समझ लड़ता रहा,
और असल में थी वो जिन्दगी,
बस कोंधते रहते कई कई,
वो सवाल मेरे जेहन में अक्सर,
...........मन वकील