Monday, 16 July 2012

कैद किये हुए वो सपने,
आज भी झांकते रहते,
कभी फटी हुई शर्ट से,
कभी मैली बनियान से,
कभी कभी तो गिर पड़ते,
उसकी कुचली पतलून की,
फटी हुई जेब से धडाम से,
कितनी कोशिश करता वो,
अपनी थकी हुई उँगलियों से,
उन सपनो को रोकने की,
पर ना जाने कैसे, हर बार,
वो फिसल ही जाते हमेशा,
उसकी पकड़ से निकलकर,
कभी कभार वो रोकता उन्हें,
अपनी पथराई आँखों में रख,  
फिर कोई वजह, बेवजह ही,
आकर उड़ेल देती, अचानक
आंसुओं की भरी वो गागर,
उन आँखों के कोनों के रास्ते,
वो सपने बह जाते, तेज़ी से,
छोड़ जाते उसके दिल में,
दर्द के निशान, गहरे निशान,
वो बस चुपचाप खड़ा रहता,
शायद और सपने आने की,
इंतज़ार में युहीं रहता खड़ा ....
==मन वकील 

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