कौन है? जो कभी पेड़ ना था,
जिसकी शाखों पर आ आकर,
कभी सपनों के पंछी ना बैठे हो,
या फिर मौसम की सर्द हवा,
आकर उसे कंपकपा न गयी हो,
या फिर तपते सूरज की तपिश,
उसकी छाल को जला ना दिया हो,
झड़ जाते होंगे उसके वो हरे पत्ते,
पीले हो होकर दुखों से मिलकर,
नमी आंसुओं की भी बहती होगी,
वो अहसास किया होगा महसूस,
सावन की बूंदों सी खुशियों का,
या फिर अचानक जल उठने का,
हर कोई यहाँ एक पेड़ बन जिया,
कोई पीपल बना रहा जीवन में,
कुछ बने रहे नीम से गुणों से भरे,
कोई ताड़ सा बन जिया ऐसे,
अलग अहंकार में अकड़ कर,
कोई बेल सा लिपटा रहा होगा,
सदा दूसरों के सहारे,घूमघूम कर,
कोई अमरबेल सा भी रहा होगा,
चूसता रहता है दूसरों को हमेशा,
हर कोई पेड़ है और पेड़ जैसे ही,
अपनी जमीन खोजता रहता है,
अपनी जड़े फैलाने के लिए हमेशा,
कुछ जमे रहते कई कई सालों तक,
कुछ एक जीते है कई युगों तक,
कुछ मुझ जैसे जमीन में धंसे-धंसे,
ढूंढ़ते रहते है एक जड़ सा विश्वास,
शायद आँधियों का सामना करते,
सदैब झुक झुक कर, नत-मस्तक हो,
शायद तभी जी जाते वो हर मौसम,
तभी तो कहता हूँ मैं यह अक्सर,
कौन है? जो कभी पेड़ ना था,
==मन-वकील
जिसकी शाखों पर आ आकर,
कभी सपनों के पंछी ना बैठे हो,
या फिर मौसम की सर्द हवा,
आकर उसे कंपकपा न गयी हो,
या फिर तपते सूरज की तपिश,
उसकी छाल को जला ना दिया हो,
झड़ जाते होंगे उसके वो हरे पत्ते,
पीले हो होकर दुखों से मिलकर,
नमी आंसुओं की भी बहती होगी,
वो अहसास किया होगा महसूस,
सावन की बूंदों सी खुशियों का,
या फिर अचानक जल उठने का,
हर कोई यहाँ एक पेड़ बन जिया,
कोई पीपल बना रहा जीवन में,
कुछ बने रहे नीम से गुणों से भरे,
कोई ताड़ सा बन जिया ऐसे,
अलग अहंकार में अकड़ कर,
कोई बेल सा लिपटा रहा होगा,
सदा दूसरों के सहारे,घूमघूम कर,
कोई अमरबेल सा भी रहा होगा,
चूसता रहता है दूसरों को हमेशा,
हर कोई पेड़ है और पेड़ जैसे ही,
अपनी जमीन खोजता रहता है,
अपनी जड़े फैलाने के लिए हमेशा,
कुछ जमे रहते कई कई सालों तक,
कुछ एक जीते है कई युगों तक,
कुछ मुझ जैसे जमीन में धंसे-धंसे,
ढूंढ़ते रहते है एक जड़ सा विश्वास,
शायद आँधियों का सामना करते,
सदैब झुक झुक कर, नत-मस्तक हो,
शायद तभी जी जाते वो हर मौसम,
तभी तो कहता हूँ मैं यह अक्सर,
कौन है? जो कभी पेड़ ना था,
==मन-वकील
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