Saturday, 14 July 2012

मैं क्या हूँ? मैं क्या करता हूँ?
मैं क्यों करता हूँ अक्सर ऐसे?
कई सवाल कुलबुलाते रहते,
मेरे जेहन में, बार बार युहीं,
किस बात की झूठी आस है,
क्या उम्मीद का है फलसफां,
इक आह पीछा छोड़ जाती जो,
दूसरी जल्द ही घर कर लेती,
मेरे आंसुओं के दरिया में आकर,
सोच, क्या सोच है बस मेरी,
बीती यादों का कफ़न लपेटे,
बस उठाती रहती हर वक्त,
उनके साथ बिताये पलों का,
वो बोझ,जो हर रोज़ बढ़ता,
दिल कितना टूटे?क्या करूँ?
आखिर हर वक्त मरना भी,
मुझे रास नहीं आता है अब,
कोई कमी थी? या नहीं,
मुझे क्यों कोसता रहता?
अकसर वो, नाकामियाब मैं,
लोग कहते, छोड़ दे आगे बढ़,
पर जो खाल बन चिपका हो,
उसे तो मरने के बाद ही, मैं,
शायद अलग कर पाऊँ खुद से,
दुःख नहीं है, बस इक कमी है,
जो मुझे याद दिलाती रहती,
शिकस्त का वो तीखा अहसास,
हर बार ही क्यूँ मैं हार गया?
जीत न सका कभी भी मैं,
शायद जंग समझ लड़ता रहा,
और असल में थी वो जिन्दगी,
बस कोंधते रहते कई कई,
वो सवाल मेरे जेहन में अक्सर,
...........मन वकील 

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